
रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597

मनावर। जिला धार।। नर्मदा परिक्रमा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन, समर्पण और आत्मसंयम की कठिन साधना मानी जाती है। कहा जाता है कि तपस्या केवल गंगा किनारे, पहाड़ों की गोद में या किसी गुफा में बैठकर करने का नाम नहीं है। जिस कार्य को मन, बुद्धि और पूर्ण समर्पण के साथ किया जाए, वही तपस्या का स्वरूप बन जाता है। नर्मदा परिक्रमा भी साधक को इसी भाव का संदेश देती है—नर्मदे हर।
मनावर के समीप ग्राम सेमल्दा में मां नर्मदा अविरल बहती हैं। मां नर्मदा की पावन उपस्थिति के कारण वर्षभर अनेक साधु-संत, तपस्वी_महात्मा और नर्मदा परिक्रमावासी मनावर क्षेत्र में पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों को इन संत-महात्माओं के दर्शन, सेवा और उनके साथ धर्म एवं अध्यात्म पर शास्त्रार्थ का लाभ मिलता है। संतों का आगमन क्षेत्रवासियों के लिए गर्व और सौभाग्य का विषय माना जाता है।

*नर्मदा परिक्रमा का विधान और महत्व* नर्मदा परिक्रमा को सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र साधना माना गया है। परिक्रमावासी मां नर्मदा को साक्षात देवी स्वरूप मानकर उनके तटों के साथ निर्धारित परंपरा के अनुसार यात्रा करते हैं। इस दौरान संयम, सात्विकता, सेवा, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति सम्मान का विशेष महत्व रहता है। लंबी पैदल यात्रा, कठिन परिस्थितियों में रहना, सीमित साधनों में जीवनयापन और निरंतर मां नर्मदा का स्मरण करना इस यात्रा को तपस्या का स्वरूप प्रदान करता है। परिक्रमा साधक को धैर्य, त्याग और अहंकार से दूर रहने की प्रेरणा देती है।
*नगर तथा अंचल में सेवा और सत्कार की परंपरा* नर्मदा तट से जुड़े इस क्षेत्र में परिक्रमावासियों की सेवा को धार्मिक कर्तव्य और पुण्य कार्य के रूप में देखा जाता है। वर्षभर *बंकनाथ अटल दरबार सदावृत समिति* द्वारा नर्मदा परिक्रमावासियों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था की जाती है। यहां परिक्रमावासियों को प्रतिदिन दोनों समय शुद्ध सात्विक भोजन एवं फलाहार कराया जाता है। यह सेवा केवल भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि दूर-दूर से आने वाले परिक्रमावासियों को अपनत्व, विश्राम और सम्मान देने की परंपरा का हिस्सा है। सेवा भाव की यह परंपरा नर्मदा तट की लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था को और मजबूत करती है।

*श्रावण में कांवड़ियों की सेवा* श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है। सावन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पवित्र नदियों से कांवड़ में जल भरकर पैदल यात्रा करते हैं और दूर-दराज के गांवों तथा शहरों में स्थित शिवालयों में पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मनावर में श्रावण मास के दौरान कांवड़ियों की सेवा का भी विशेष प्रबंध किया जाता है। *जिला पंचायत सदस्य गणेश जर्मन* द्वारा सभी कांवड़ियों के लिए फलाहार की व्यवस्था की जाती है। कठिन यात्रा पर निकले श्रद्धालुओं के लिए यह सेवा उनकी आस्था और संकल्प को सहयोग देने के साथ-साथ समाज में सेवा एवं सहयोग की भावना का संदेश देती है।

*जलाभिषेक के पीछे धार्मिक मान्यता* पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। विष की उष्णता को शांत करने के लिए देवताओं द्वारा भगवान शिव का जलाभिषेक किया गया। इसी धार्मिक भाव से सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा को विशेष महत्व प्राप्त हुआ।

एक अन्य धार्मिक परंपरा में भगवान परशुराम द्वारा गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने का उल्लेख मिलता है। इसी धार्मिक परंपरा से कांवड़ यात्रा की शुरुआत को जोड़कर देखा जाता है।

*तपस्या, त्याग और लोककल्याण का संदेश*;कांवड़ यात्रा में श्रद्धालु कई किलोमीटर तक पैदल चलते हैं। अनेक कांवड़िए नंगे पैर यात्रा करते हैं और सात्विक भोजन तथा विभिन्न धार्मिक अनुशासनों का पालन करते हैं। यात्रा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत मनोकामना पूरी करना नहीं, बल्कि परिवार, वंश, समाज और समस्त जीव-जगत के कल्याण की भावना से भी जुड़ा होता है।
नर्मदा परिक्रमा और कांवड़ यात्रा दोनों ही भारतीय सनातन परंपरा में जल, प्रकृति, साधना और ईश्वर के प्रति समर्पण का संदेश देती हैं। एक ओर परिक्रमावासी मां नर्मदा के तट पर चलकर आत्मसंयम और श्रद्धा की साधना करते हैं, वहीं कांवड़िए नर्मदा या अन्य पवित्र नदियों का जल लेकर भगवान शिव को अर्पित करते हुए भक्ति और संकल्प का परिचय देते हैं।
सेमल्दा में मां नर्मदा की पावन धारा, साधु-संतों एवं परिक्रमावासियों का निरंतर आगमन और स्थानीय लोगों द्वारा की जाने वाली सेवा इस क्षेत्र की धार्मिक परंपरा को जीवंत बनाए हुए है। वर्षभर परिक्रमावासियों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था तथा श्रावण में कांवड़ियों के लिए फलाहार की सेवा ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ की भावना को चरितार्थ करती है।
नर्मदा परिक्रमा हमें समर्पण और धैर्य सिखाती है, कांवड़ यात्रा सेवा, संयम और शिवभक्ति का संदेश देती है और संत-सेवा हमें भारतीय संस्कृति की उस परंपरा से जोड़ती है, जिसमें अतिथि और साधु-संतों की सेवा को सौभाग्य माना गया है। नर्मदे हर। हर हर महादेव।

