

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977697

मनावर। जिला धार।। परंपरानुसार इस वर्ष भी नगर में गोवर्धन पूजा पर्व धूमधाम से मनाया गया। गोपालक समाज द्वारा गौवंश को श्रृंगारित कर भक्तिभाव से पूजा अर्चना की गई। बड़ी तादाद में श्रद्धालुजन गौशाला भी पहुंचे और गाय बछड़े की विधि विधान से पूजा की गई। सदर बाजार स्थित नरसिंह मंदिर में शाम को गोधूलि बेला के अवसर पर भगवान को 56 भोग अर्पित कर अन्नकूट की प्रसादी का वितरण होगा। यहां महाआरती और आतिशबाजी की जाएगी। सूर्यास्त प्रदोषकाल में मान नदी के तट पर तथा नगर के जल सरोवरों में बड़ी तादाद में महिलाओं द्वारा दीप दान किया जाएगा।

गोवर्धन पूजा पर्व दिवाली के अगले दिन मनाया जाता है। इसे प्रकृति और गाय की पूजा के रूप में किया जाता है। यह त्योहार ब्रज (मथुरा, वृंदावन), मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन गोबर से गोवर्धन बनाकर पूजा की जाती है।

बताया जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्रदेव के अहंकार को दूर किया था। इसे अन्नकूट पर्व भी कहते हैं। क्योंकि इस दिन 56 प्रकार के व्यंजन जैसे दाल, चावल, मिठाई, फल, सब्ज़ी आदि भगवान को भोग में चढ़ाए जाते हैं। गोवर्धन पूजा हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को होती है। इस साल अमावस्या तिथि 21 अक्टूबर को शाम को समाप्त हुई इसलिए उदायतिथि के अनुसार गोवर्धन पूजा पर्व और अन्नकूट महोत्सव 22 अक्टूबर को मनाया गया।

पूजा की विधि: सुबह जल्दी उठकर घर और आंगन को साफ करके गाय के गोबर या अनाज से छोटे गोवर्धन पर्वत बनाएं जाते है। उसके आस-पास बछड़े और ग्वालिन की मूर्तियां बनाई जाती है। फूल, फल, दुग्ध, जल और अन्न अर्पित पर विधि पूर्वक पूजन करते हैं। पूजा के बाद गोवर्धन की परिक्रमा की जाती है। इस दिन गाय और बछड़ों की भी पूजा कर उन्हें गुड़ और चारा खिलाया जाता है। मंदिरों में भगवान को छप्पन भोग लगाया जाता है। मंदिरों में महाआरती और अन्नकूट की महाप्रसादी का वितरण होता है। शाम को नदी तथा अन्य जल सरोवरों में दीपदान का भी विशेष विधान है।

पौराणिक कथा: विष्णु पुराण के अनुसार, इंद्रदेव अपनी शक्ति पर अभिमानी हो गए थे। गोकुल में लोग इंद्रदेव की पूजा कर रहे थे, लेकिन बाल कृष्ण ने कहा कि हमारी गायों और गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। इंद्रदेव ने क्रोधित होकर बारिश भेजी, लेकिन कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत अपनी उंगली पर उठा लिया और गांववालों को सुरक्षित रखा। इंद्रदेव ने अंत में भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी। तभी से गोवर्धन पूजा उत्सव के रूप में की जाती है।

बताया जाता है कि आज का पावन दिन हमें भगवान श्रीकृष्ण की उस दिव्य लीला की याद दिलाता है, जब उन्होंने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर व्रजवासियों की रक्षा की थी। यह दिन हमें सिखाता है कि सच्चा बल बाहुबल में नहीं, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और भक्ति में होता है। गोवर्धन पूजा का संदेश है “प्रकृति ही हमारी सच्ची पूजनीय है।” जिस मिट्टी में हम जन्म लेते हैं, जो जल हमें जीवन देता है, जिन पशुओं से हमें अन्न और सहारा मिलता है वही हमारे आराध्य हैं। गोवर्धन पूजा का यह पावन दिवस हमें प्रकृति, अन्न और गौ संवर्धन के प्रति कृतज्ञता का भाव सिखाता है। यह पर्व सह-अस्तित्व, परोपकार और समर्पण के संस्कारों को सशक्त करता है। इस परंपरा के माध्यम से प्रकृति और पशुधन की सेवा का भी संकल्प लिया गया।