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पर्यटक नगरी मांडू में भगोरिया पर्व, ढोल-मांदल की थाप नृत्यः  केंद्रीय मंत्री ठाकुर और विदेशी पर्यटक जमकर थिरके,वही भाजपा अजजा मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष जयराम गावर साफा बांधकर स्वागत किया

पर्यटक नगरी मांडू में भगोरिया पर्व, ढोल-मांदल की थाप नृत्यः

 

केंद्रीय मंत्री ठाकुर और विदेशी पर्यटक जमकर थिरके,वही भाजपा अजजा मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष जयराम गावर साफा बांधकर स्वागत किया

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राहुल सेन मांडव

मो 9669141814

 

मांडू न्यूज/मांडू में शनिवार को आदिवासी संस्कृति का उत्सव ‘भगोरिया’ पूरे उत्साह के साथ मनाया गया। अशर्फी महल और जामा मस्जिद जैसे प्राचीन स्थलों के बीच भारत माता चौक पर ढोल-मांदल की थाप और पारंपरिक नृत्यों ने समां बांध दिया।

 

इस बार के भगोरिया हाट में 30 से ज्यादा मांदल दल अपनी खास वेशभूषा में पहुंचे।मांडू भगोरिया मेले में धार-महू सांसद और केंद्रीय मंत्री सावित्री ठाकुर,भाजपा अजजा मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष मांडू नगर परिषद अध्यक्ष प्रतिनिधि जयराम गावर और चतुर्भुज श्री राम मंदिर मांडू के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर डॉ. नरसिंह दास महाराज वह कई जनप्रतिनिधि भी शामिल हुए।

 

वही ये सभी आदिवासी युवाओं के साथ ढोल-मांदल की धुन पर नाचते और उनका उत्साह बढ़ाते नजर आए।

 

देशी-विदेशी सैलानियों का जमावड़ा

 

दोपहर 3 बजे के बाद मेले में भारी भीड़ उमड़ी। ग्रामीणों के साथ-साथ विदेशी पर्यटक भी इस लोक संस्कृति का आनंद लेने पहुंचे। बाजार में बर्फ गोला, कुल्फी, पान और पारंपरिक ‘हार-कांकणी’ (शकर के खिलौने) की दुकानों पर खासी रौनक रही। अलग-अलग संगठनों और पार्टियों द्वारा स्वागत मंच लगाकर मांदल दलों का साफा बांधकर और फूलों से स्वागत किया गया।

 

भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष ने बजाई मादल वही केंद्रीय मंत्री ने क्या नृत्य

 

 

वही भगोरिया में भाजपा अजजा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष वह मांडू नगर परिषद अध्यक्ष प्रतिनिधि जयराम गावर ने मादाल बजाई वही महिला एवं बाल विकास केंद्रीय राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर ने नृत्य किया

 

वही सुरक्षा के रहे कड़े इंतजाम

 

जिला पुलिस अधीक्षक मयंक अवस्थी के निर्देश पर मांडू भगोरिया मेले में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम दिखे। दो थानों के प्रभारियों के साथ 40 से ज्यादा जवानों ने मोर्चा संभाला, ताकि उत्सव बिना किसी बाधा के संपन्न हो सके।

 

अंचल में होली से पहले लगने वाले हाट को भगोरिया मेले के रूप में मनाने की पुरानी परंपरा है, जो आज भी जीवंत है।

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