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राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था पर गहराता संकट

संपादकीय: राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था पर गहराता संकट—खाली पदों का बोझ और भविष्य पर सवाल

संपादक की कलम से:

​राजस्थान, जो कभी शिक्षा के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने के लिए जाना जाता था, आज एक गंभीर विडंबना का सामना कर रहा है। प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के हजारों खाली पद केवल आंकड़ों का खेल नहीं हैं, बल्कि यह हमारे आने वाली पीढ़ी के भविष्य के साथ हो रहा खिलवाड़ है। जब स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो शिक्षा की गुणवत्ता और साक्षरता का सपना कैसे साकार होगा?

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​खाली पदों का दंश और शिक्षा का गिरता स्तर

​आज स्थिति यह है कि प्रदेश के विभिन्न स्तरों पर लाखों पद रिक्त पड़े हैं। स्कूल व्याख्याताओं से लेकर वरिष्ठ अध्यापक और तृतीय श्रेणी शिक्षकों की भारी कमी ने व्यवस्था को चरमरा दिया है। इसका सबसे भयावह प्रभाव ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है, जहाँ एक या दो शिक्षकों के भरोसे पूरा विद्यालय चल रहा है।

  • अधूरी पढ़ाई: समय पर शिक्षकों की नियुक्ति न होने से विद्यार्थियों का पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो पाता, जिसका सीधा असर परीक्षाओं और उनके परिणामों पर पड़ता है।
  • विशेषज्ञों का अभाव: माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे मुख्य विषयों के विशेषज्ञ शिक्षकों का न होना छात्रों को निजी स्कूलों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर कर रहा है।
  • नेतृत्व का संकट: स्कूलों में प्रधानाचार्य और उप-प्रधानाचार्य के रिक्त पद प्रशासनिक व्यवस्था को भी पंगु बना रहे हैं।

​प्रशासनिक उदासीनता और कानूनी पेच

​सरकार द्वारा भर्तियों की घोषणाएं तो की जाती हैं, लेकिन अक्सर वे या तो कानूनी दांव-पेंच में उलझ जाती हैं या फिर भर्ती प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि पद भरने की गति खाली होने की गति से काफी पीछे रह जाती है। पदोन्नति (DPC) में देरी और समयबद्ध भर्ती कैलेंडर का अभाव इस संकट को और गहराता है।

​निष्कर्ष और सुझाव

​शिक्षा मात्र एक विभाग नहीं, बल्कि राज्य की रीढ़ है। यदि हम इसे सुधारना चाहते हैं, तो सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:

  1. समयबद्ध भर्ती कैलेंडर: हर वर्ष रिक्त होने वाले पदों का आकलन कर समय पर भर्ती प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।
  1. पारदर्शी पदोन्नति प्रक्रिया: डीपीसी (DPC) के लंबित मामलों का त्वरित निस्तारण हो ताकि स्कूलों में नेतृत्व और विषय विशेषज्ञों की कमी न रहे।
  2. शिक्षक-छात्र अनुपात: आरटीई (RTE) के मानकों के अनुरूप स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती सुनिश्चित की जाए।

​शिक्षा व्यवस्था को केवल कागजों और भाषणों तक सीमित न रखकर धरातल पर सुधारना होगा। अन्यथा, आने वाली पीढ़ी का नुकसान न केवल राजस्थान का, बल्कि पूरे देश का नुकसान होगा। सरकार को इस संकट को प्राथमिकता के आधार पर हल करने की तत्काल आवश्यकता है।

सु

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