

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo9179977597
मनावर। जिला धार।। संजा जिसे संजा बाई, संझा और सुखसंजा भी कहा जाता है। मालवा निमाड़ या मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक लोकपर्व है। यह पर्व प्रकृति, लोक कला और संस्कृति का अनूठा संगम है। जो मुख्य रूप से कुंवारी लड़कियों की रचनात्मकता और सामाजिक जुड़ाव को दर्शाता है। यह पर्व युवतियों द्वारा भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक 16 दिनों तक मनाया जाता है। ये 16 दिन पितृ पक्ष के साथ आते हैं। इस दौरान, युवतियों प्रतिदिन सुबह के समय गोबर और फूलों से घर की दीवारों पर संजा के सुंदर भित्तिचित्र बनाती हैं और सुबह शाम दोनों समय पूजा कर अपनी सहेलियों के साथ लोकगीत गाती हैं।
पौराणिक महत्व: संजा लोकपर्व का सीधा संबंध माता पार्वती से माना जाता है। मान्यता अनुसार, संजा एक ऐसी किशोरी थी जो भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थी। भगवान शिव ने उसके तप और श्रद्धा को देखकर उसे यह वरदान दिया कि जो युवतियों 16 दिनों तक संजा की आराधना करेंगी, उन्हें मनचाहा और योग्य वर मिलेगा। कुछ शास्त्रों के अनुसार धरती पुत्रियां सांझी को ब्रह्मा की मानसी कन्या संध्या, दुर्गा, पार्वती तथा वरदायिनी आराध्य देवी के रूप में पूजती हैं। सांजी, संजा, संइया और सांझी जैसे भिन्न-भिन्न प्रचलित नाम अपने शुद्ध रूप में संध्या शब्द के द्योतक हैं। इसी मान्यता के कारण यह पर्व कुंवारी युवतियों के लिए विशेष महत्व रखता है। इसके अलावा, यह पर्व पितृ पक्ष के दौरान मनाया जाता है, इसलिए इसे पितरों की शांति और समृद्धि से भी जोड़ा जाता है। माना जाता है कि इन दिनों में पितर धरती पर आते हैं और संजा के माध्यम से उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। संजा पर्व के पांच अंतिम दिनों में हाथी-घोड़े, किला-कोट, गाड़ी आदि की आकृतियां बनाई जाती हैं।
संजा पर्व की खासियत……….
चित्रकला और कला: इस पर्व की सबसे बड़ी खासियत गोबर और विभिन्न रंगों के फूलों से बनाई जाने वाली कलाकृति है। पहले दिन, संजा की आकृति बनाई जाती है और अगले 15 दिनों तक उसमें सूर्य, चंद्रमा, तारे, किले और अन्य लोक चित्र उकेरे जाते हैं। अंतिम दिन, ‘किलेकोट’ बनाया जाता है, जिसमें किले और द्वारपालों की आकृतियां होती हैं।
लोकगीत: हर शाम, लड़कियां संजा के सामने इकट्ठी होकर पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। ये गीत 16 दिनों के चित्रों और संजा के जीवन से संबंधित होते हैं, जैसे ‘संजा कोनी केत है’, ‘एकली खड़ी रहे म्हारी संजा’, ‘सूरज म्हारा केवड़ो’ आदि।
सामाजिक जुड़ाव: यह पर्व एक समुदाय के रूप में मनाया जाता है। लड़कियां समूह में मिलकर कलाकृतियां बनाती हैं, गीत गाती हैं और एक-दूसरे के घरों में जाती हैं, जिससे उनके बीच सामाजिक मेलजोल और दोस्ती बढ़ती है।
प्रकृति से जुड़ाव: इस पर्व में प्राकृतिक चीजों जैसे गोबर, मिट्टी और मौसमी फूलों का उपयोग किया जाता है, जो इसे प्रकृति के करीब लाता है।
संजा का समापन: पितृ पक्ष के 16वें दिन, जिसे ‘पिपलिया पूनो’ भी कहा जाता है, संजा का विसर्जन किया जाता है। युवतियां संजा को तालाब या नदी में विसर्जित करती हैं और अंतिम गीत गाते हुए उनसे अगले साल फिर से आने का अनुरोध करती हैं। इसके बाद प्रसाद के रूप में पूरी और पकवान का वितरण होता है। अमावस्या को 16 दिन बनाई गई सूखसंजा पर्व के दिनों में रोजाना शाम को युवतियां अपनी सहेलियों के घर-घर जाकर कई गीत गाकर संजा को मनाती हैं एवं प्रसाद वितरण किया जाता हैं। संजा पर गाए जाने वाले गीत…
संझा बाई को छेड़ते हुए युवतियां ये गाती हैं..
‘संझा बाई का लाड़ाजी.., लूगड़ो लाया जाड़ाजी..
‘संझा.. तू थारा घर जा.. कि थारी मां मारेगी कि …
‘म्हारा अंगना में मेंदी को झाड़.., दो-दो पत्ती चुनती थी..
संझा बाई को ससुराल जाने का संदेश देते हुए ये गाया जाता है…
‘छोटी-सी गाड़ी लुढ़कती जाय.., जिसमें बैठी.
‘म्हारा आकड़ा सुनार, म्हारा बाकड़ा सुनार..
‘संझा बाई का सासरे से, हाथी भी आया.. घोड़ा भी आया..
दादाजी समझाते हुए कहते हैं…
‘हाथी हाथ बंधाऊं, घोड़ा पाल बंधाऊं…
गीतो के अंत में गाया जाता है…
‘संझा तू जिम ले.. चूढ ले.. मैं जिमाऊं सारी रात.., चमक चांदनी सी रात.., फूलो भरी रे परात.., एक फूलो घटी गयो.., संझा माता रूसी गई.., और फिर एक घड़ी, दो घड़ी, साढ़े तीन घड़ी।’ कहकर प्रसाद बाटा जाता है।
प्रसाद ताड़ना: प्रसाद को बांटने के पहले प्रसाद को ढककर रखा जाता है। जिसे ताड़ना कहते है। युवतियां नित नई चीजें प्रसाद बांटने के लिए लाती है ताकि उनके प्रसाद को कोई ताड़ नहीं सके। उत्साह, उमंग, हास्य और मस्ती के साथ मनाए जाने वाला यह पर्व अद्भुत और आलौकिक हैं।
आज कल बदलते समय के साथ इस पर्व में आधुनिक तरीके अपनाए जाने लगे हैं। शहरों में अब गोबर के स्थान पर बाजारों में कागज पर उकेरे या रचे हुए मांडनों का उपयोग होने लगा है, जिन्हें लड़कियां दीवारों पर चिपकाकर पूजन करती हैं। ज्ञात हो कि इस बार पितृपक्ष 07 सितंबर रविवार से शुरू होकर 21 सितम्बर 2025 रविवार तक जारी रहेगा।