


सिंगरौली का आईक्यू लेबल खतरे से पार फिर भी अदानी द्वारा पेडों की कटाई जारी
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मध्य प्रदेश का सिंगरौली जिला प्रदूषण मे देश में सबसे ज्यादा है जिसका आईक्यू लेबल 375 है जो कि देश की राजधानी दिल्ली मे 378 से थोड़ा कम है जबकि यह आकंड़े जंगल कटने के पहले का है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सिंगरौली मे आमजीवन व वन्यजीव कैसे जीवन यापन कर रहे हैंलेकिन सरकार इस ओर ध्यान देने के बजाय वनों को नष्ट करवाने में लगी हुई है।
सिंंगरौली:जिले मे इनदिनों वनों की कटाई को लेकर बहस छीड़ी हुई है सरकार ने ऊर्जा उत्पादन के लिए कोयला निकालने का कार्य कोल इंडिया की अनुगामी कंपनियों को ठेका दे रखा है जिसमें एनसीएल, अदानी की कोल माइंस (घीरौली कोलमाइंस) ,हिंंडाल्को कंपनी की कोलमाइंस (बंधा कोलमाइंस),रिलायंस इंडस्ट्रीज, एपीएमडीसी,टीएचडीसी जैसी तमाम कंपनियां कोयला उत्खनन का कार्य कर रही हैं जिसमें सबसे ज्यादा अदानी की कोलमाइंस (घीरौली कोलमाइंस) के लिए जंगल काटा जा रहा है। जब इसके क्लीयरेंस की पूरी प्रक्रिया देखेंगे तो आपको लगेगा कि कोई मजाक चल रहा है। पूरी प्रक्रिया ऐसी की गई है जैसे विभाग सिर्फ क्लीयरेंस देने के लिए ही बैठा हो। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से लगभग 6 लाख पेड़ कट रहे हैं। लेकिन सच्चाई तो यह है की वन विभाग 20 सेंटीमीटर मोटे पेड़ से नीचे पेड़ों की गिनती ही नहीं करता। काटने वाले पेड़ों की संख्या 6 लाख से कई गुना ज्यादा है। अपनी एसेसमेंट रिपोर्ट में वन विभाग खुद इस खतरे को बता रहा है कि यहां खनन होने से जंगल की कई महत्वपूर्ण वन्यजीव के विलुप्त होने का खतरा है। मंत्रालय ने भी यह पूछा कि इतने प्राचीन और महत्वपूर्ण जंगल को काटने की ऐसी क्या जरूरत है। जिसके जस्टिफिकेशन में अदानी कंपनी ने यह तर्क दिया कि देश की ऊर्जा जरूरत पूरी करने और देश की वेल्थ बढ़ाने के लिए यह किया जा रहा है और मंत्रालय ने इस जस्टिफिकेशन को मान भी लिया। कई दिनों की मेहनत के बाद यह इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट लिखी है जिसकी लिंक नीचे कमेंट बॉक्स में उसके कुछ महत्वपूर्ण बिंदु नीचे साझा कर रहा हूं।
1. नवंबर 2023 तक सीसीएफ रीवा की रिपोर्ट में जहां यह साफ था प्रस्तावित एलिफेंट कॉरिडोर घिरौली कोल ब्लॉक से गुजर रहा है। लेकिन 2024 तक पर्यावरण मंत्रालय को दिए जवाब में मध्य प्रदेश वन विभाग कॉरिडोर को कॉल ब्लॉक से 5 किलोमीटर दूर बता देती है। यह कैसे हुआ कब हुआ क्यों हुआ। इसकी परवाह न तो पर्यावरण मंत्रालय को और ना ही विभाग को।
2. बाघ के अलावा 18 ऐसे वन्य जीव, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 में आते हैं। खदान की क्लीयरेंस के लिए चली नोटशीट में इनका का जिक्र तक नहीं है। जबकि बाघ ने अभी नवंबर में जंगल से सटे बासी बेरदह गांव की दो गाय को अपना शिकार बनाया है।
3. सीधी का संजय दुबरी नेशनल पार्क जो की टाइगर रिजर्व भी है वह खदान के बफर से बस 70 मीटर दूर है यह लगा हुआ सतत जंगल है
4. इस साल के पेड़ों का प्राचीन जंगल है। मध्य प्रदेश के कई फॉरेस्ट के पुराने और नई अफसर ने बताया कि मध्य प्रदेश में साल के पेड़ों का वृक्षारोपण सफल नहीं ऐसे कई प्रयोग फेल हुए है।