

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। जिला धार।। भाद्रपद की पूर्णिया से लेकर सर्व पितृ अमावस्या तक मालवा और निमाड़ की दीवार पर संजा माता बनाकर पूजा अर्चना आराधना की जाती है। संजा पर्व में कुंवारी कन्याओं द्वारा मन की कोमल भावनाओं को सपनों और अभिलाषाओ को 16 दिनों तक अपनी उंगलियों और कल्पनाओं से रचती है। यह पर्व सांझी, संझया, माई, संझा देवी, सांझी पर्व आदि अन्य नामों से भी जाना जाता है।
संजा पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक अर्थात् पूरे श्राद्ध पक्ष में 16 दिनों तक मनाया जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार संजा माता गौरा का रूप होती है, जिनसे अच्छे पति पाने की मनोकामना की जाती है। कई स्थानों पर कन्याएं आश्विन मास की प्रतिपदा से इस व्रत की शुरुआत करती हैं। इस त्योहार को कुंआरी युवतियां बहुत ही उत्साह और हर्ष से मनाती हैं। श्राद्ध पक्ष में 16 दिनों तक इस पर्व को ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखा जाता है। संजा पर्यावरण को समर्पित एक लोक पर्व है। यह पर्व प्रकृति की देन फल-फूल, गोबर, नदी, तालाब आदि के देखरेख के साथ ही हमें इन चीजों को संजोने की प्रेरणा भी देता है।
वृक्षारोपण तथा पौधारोपण करके हम हमारी अनमोल धरा को हरा-भरा करके प्रकृति के सहायक बनते हैं और अलग-अलग रंगबिरंगी फूलों से संजा को सजाकर प्रकृति की खूबसूरती में चार चांद लगते हैं और इस तरह हर छोटे-बड़े त्योहारों को अपने जीवन में अपना कर हम प्रकृति और हमारी धार्मिक और लोक परंपराओं का संचालन करते हैं।
इन दिनों चल रहे श्राद्ध पक्ष के पूरे 16 दिनों तक कुंआरी कन्याएं हर्षोल्लासपूर्ण वातावरण में दीवारों पर बहुरंगी आकृति में ‘संजा’ गढ़ती हैं तथा ज्ञान पाने के लिए सिद्ध स्त्री देवी के रूप में इसका पूजन करती हैं।
लोक मान्यता के अनुसार- ‘सांझी’ सभी की ‘सांझी देवी’ मानी जाती है। संध्या के समय कुंआरी कन्याओं द्वारा इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। संभवतः इसी कारण इस देवी का नाम ‘सांझी’ पड़ा है। कई स्थानों पर इसे संजा फूली पर्व भी कहा जाता है।
संजा पर्व के पांच अंतिम दिनों में हाथी-घोड़े, किला-कोट, गाड़ी आदि की आकृतियां बनाई जाती हैं। 16 दिन के लोक पर्व के अंत में अमावस्या को सांझी देवी को विदा किया जाता है। इन दिनों संजा पर्व के मधुर लोक गीत भी सुनाई पड़ते हैं।
16 दिनों कि प्रतिदिन गोबर से अलग-अलग संजा बनाकर फूल व अन्य चीजों से उसका श्रृंगार किया जाता है पर्व पर जब गोबर बोलता है और फूल मुस्कुराते हैं तथा अंतिम दिन संजा को तालाब व नदी में विसर्जित किया जाता है। इस तरह इस पर्व का समापन हो जाता है।
आजकल बदलते समय के साथ इस पर्व में आधुनिक तरीके अपनाए जाने लगे हैं। शहरों में अब गोबर के स्थान पर बाजारों में कागज पर उकेरे या रचे हुए मांडनों का उपयोग होने लगा है, जिन्हें युवतियां दीवारों पर चिपकाकर पूजन करती हैं यह मालवा और निमाड़ की लोक कला और संस्कृति का अनूठा उत्सव है।