
रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। जिला धार।। म प्र जन अभियान परिषद विकासखंड मनावर द्वारा आज 26 अप्रैल को शासकीय महाविद्यालय मनावर में आयोजित सीएमसीएलडीपी कक्षा संचालन के दौरान आदि गुरु शंकराचार्य जयंती हेतु व्याख्यान माला पखवाड़ा कार्यक्रम मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा आदि गुरु शंकराचार्य जी के छाया चित्र पर माल्यार्पण एवं द्वीप प्रज्ज्वलित कर किया गया तत्पश्चात अतिथिओ के स्वागत बाद, कार्यक्रम की रूपरेखा एवं उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए विकास खण्ड समन्वयक भुवान सिंह ने बताया कि राज्य कार्यालय के निर्देशानुसार निर्धारित 22 से 26 अप्रैल के मध्य आदि गुरु शंकराचार्य जी का जन्म दिवस कार्यक्रम विकास खण्ड स्तर पर मनाया जाना है।
इसी कड़ी में आज दिनांक 26 अप्रैल को विकास खण्ड मनावर में आदि गुरु शंकराचार्य जी की जयंती को एक पखवाड़े के रूप में मनाया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य आज की शिक्षित युवा पीढ़ी एवं ग्रामीण समुदाय को आदि गुरु शंकराचार्य जी के जीवन, उनके विचारों, उनके सिद्धांतो, एवं सनातन धर्म में उनके योगदान से अवगत कराना।मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित बख्तावर सोलंकी ने उपस्थित प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए आदि गुरु शंकराचार्य जी के जीवन वृतांत पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आदि गुरु शंकराचार्य जी का जन्म विपरीत परिस्थितियों में कर्नाटक के एनार्कुलम जिले के कालड़ी नामक ग्राम में एक नि:संतान ब्राह्मण परिवार में विशेष कर सनातन धर्म विस्तार के लिए हुआ था। इसलिए आदि गुरु शंकराचार्य ने समाज को हिंदू संस्कृति एवं सनातन धर्म संस्कृति की मुख्य धारा से जोड़ने हेतु संपूर्ण भारत का भ्रमण कर चार प्रमुख दिशाओं में चार प्रमुख मठों की स्थापना की थी। जिन्हें शारदा मठ, श्रृंगेरी मठ, गोवर्धन मठ, ज्योर्तिमठ के नाम से जाना जाता हैं।विशेष अतिथि के रूप में सत्यवीर तेजाजी समिति के अध्यक्ष सावन जाट ने बताया कि भारत की एकता और अखंडता एवं सनातन संस्कृति को बढ़ावा देने मे आदि गुरु शंकराचार्य जी का महत्व पूर्ण योगदान रहा। क्योंकि इनका जन्म उस समय हुआ जब भारत कई जातियों में बिखरा हुआ था। तथा बौद्ध धर्म का अधिक बोलबाला था। चुकी आदि गुरु शंकराचार्य जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे जिस कारण इनको अपनी आठ वर्ष की अल्पायु में ही वेद पुराण उपनिषद आदि का संपूर्ण ज्ञान हो गया था। जिसका इन्होंने भारत भ्रमण के दौरान प्रचार प्रसार कर सनातन धर्म को आगे बढ़ाया। कहा जाता है कि भारत भ्रमण के दौरान आदि गुरु शंकराचार्य जी ओंकारेश्वर पहुंचे। इस दौरान ओंकारेश्वर में जब मां नर्मदा के तट किनारे तपस्या कर रहे थे उस समय बाढ़ के रूप में मां नर्मदा जी ने अपना विकराल रूप धारण कर लिया। तब मां नर्मदा जी के विकराल रूप को शांत करने के लिए आदि गुरु शंकराचार्य जी ने मां नर्मदाअष्टक “त्वदिय पाद पंकजम”स्तुति का निर्माण कर मां नर्मदा जी को शांत किया। एसी कही घटनाएं है।अन्य वक्ता के रूप मे एम. एस. डब्ल्यू. प्रथम वर्ष की छात्रा टीना सोलंकी ने व्याख्यान माला कार्यक्रम को संबोधित करते बताया कि आदि गुरु शंकराचार्य जी स्वयं भगवान शिव का ही एक रूप है जो नि संतान माता पिता के द्वारा भगवान शिव की कई वर्षों की तपस्या के बाद भगवान शंकर जी ने एक शर्त पर जन्म लिया कि में सनातन धर्म को बढ़ावा देने के लिए जन्म लूंगा। जन्म के आठ वर्ष बाद आदि गुरु शंकराचार्य जी ने माताजी से संन्यासी बनने हेतु आज्ञा लेने गए तो माताजी ने ममता वंश बालक को सन्यासी बनने की आज्ञा नहीं दी। जबकि आदि गुरु शंकराचार्य जी का जन्म ही सनातन धर्म विस्तार के लिए हुआ था। लेकिन कुछ समय बाद मजबूरी में माताजी को तालाब पर नहाने के बहाने तालाब पर ले गए , तालाब में नहाते समय आदि गुरु शंकराचार्य जी का पैर मगरमच्छ ने पकड़ लिया। तब आदि गुरु शंकराचार्य जी ने माता से कहा कि माता यदि आप मुझे सन्यासी बनने की आज्ञा देती तो तो यह मगरमच्छ मुझे छोड़ देगा। उक्त स्थिति में माताजी ने बालक को मगरमच्छ से बचाने हेतु संन्यासी बनने की आज्ञा दी थी।
एम. एस.डब्ल्यू.प्रथम वर्ष छात्र गोपाल मौर्य द्वारा आदि गुरु शंकराचार्य जी के जीवन पर एक सुन्दर भजन गाया। तत्पश्चात मौर्य जी ने कहा कि हमें शंकराचार्य जी के बताए मार्ग पर चल कर ही सनातन धर्म की रक्षा कर पाएंगे।कार्यक्रम का संचालन मेंटर संतोष पाटीदार ने किया। एवं आभार मेंटर मनोहर मंडलोई ने माना। कार्यक्रम को सफल बनाने में नवांकुर संस्था प्रतिनिधि जगदीश भवेल, प्रवीण दास बैरागी, मेंटर बलराम सोलंकी, मोहन डोडवे सहित छात्र छात्राए प्रस्फुटन समिति सदस्यों आदि का सक्रिय सहयोग रहा।
