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स्वच्छ पांढुर्णा, सुंदर पांढुर्णा… या फिर सिर्फ पोस्टर और फोटो में?* ,*चंद्रभागा नदी बनी कचरा पेटी, जाम नदी भी दुर्दशा पर बहा रही आंसू

प्लास्टिक कचरे से बढ़ रहा जल प्रदूषण, बीमारियों का खतरा

*स्वच्छ पांढुर्णा, सुंदर पांढुर्णा… या फिर सिर्फ पोस्टर और फोटो में?* ,*चंद्रभागा नदी बनी कचरा पेटी, जाम नदी भी दुर्दशा पर बहा रही आंसू*

संवाददाता धनंजय जोशी
जिला पांढुरना मध्य प्रदेश

*प्लास्टिक कचरे से बढ़ रहा जल प्रदूषण, बीमारियों का खतरा*

पांढुरना- पांढुरना नगर ने स्वच्छता अभियान के अंतर्गत विभिन्न स्थानों पर अपनी पहचान बनाई है। नगर को स्वच्छता रैंकिंग में स्थान भी प्राप्त हुए हैं, जो निश्चित रूप से गर्व की बात है। लेकिन यदि इसी स्वच्छता की असली तस्वीर देखनी हो तो किसी सरकारी रिपोर्ट या सम्मान समारोह में नहीं… बल्कि नगर के बीचों-बीच बहने वाली नदियों और नालों के किनारे जाकर देखिए।
क्योंकि वहां जाकर यह साफ नजर आता है कि पांढुर्णा की स्वच्छता मुख्य सड़क तक तो पहुंच गई है, लेकिन नगर की जीवनरेखा कही जाने वाली नदियों तक अब भी नहीं पहुंच सकी।

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पांढुर्णा शहर के बीच से गुजरने वाली चंद्रभागा नदी और नगर क्षेत्र में बहने वाली जाम नदी कभी नगर की सुंदरता और पहचान का प्रतीक थीं। लेकिन आज इन नदियों का हाल देखकर लगता है कि इन्हें जल स्रोत नहीं बल्कि नगर की “स्थायी कचरा पेटी” घोषित कर दिया गया है।
इन नदियों में कई स्थानों पर प्लास्टिक, पॉलिथीन, बोतलें, खाने-पीने के पैकेट, पूजा सामग्री, घरेलू कचरा और गंदे पानी का बहाव खुलेआम देखा जा सकता है।
विडंबना यह है कि जिस नगर को स्वच्छता में पुरस्कार और सम्मान मिल रहे हैं, उसकी नदियां आज खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं… बस फर्क इतना है कि वे आंसू भी अब प्रदूषित हो चुके हैं।

*नदी किनारे स्वच्छता के नारे, नदी में प्लास्टिक का सैलाब*

नगर में जगह-जगह बोर्ड और बैनर लगे हैं-
“स्वच्छ पांढुर्णा, सुंदर पांढुर्णा”
लेकिन अगर कोई नागरिक चंद्रभागा नदी के किनारे खड़ा होकर नीचे झांक ले, तो यही नारा मजाक बनकर रह जाता है।
ऐसा लगता है कि स्वच्छता अभियान की सीमा वहीं तक है, जहां तक कैमरा पहुंचता है… और उसके आगे नदियों में सिर्फ कचरा ही बहता है।

जल प्रदूषण और बीमारियों का खतरा
नदियों में फैली यह गंदगी केवल बदबू और बदसूरती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर जल प्रदूषण और प्लास्टिक प्रदूषण को बढ़ावा दे रही है।
यह स्थिति आने वाले समय में डेंगू, मलेरिया, त्वचा रोग, पेट की बीमारियां और संक्रामक रोगों को बढ़ावा दे सकती है।
जहां पानी रुकता है, वहां मच्छर पनपते हैं और जहां गंदगी होती है, वहां बीमारी का जन्म होना तय है।

*नेताओं का स्वच्छता प्रेम: झाड़ू कम, कैमरा ज्यादा!*

अब स्वच्छता की बात हो और नेताओं का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं।
समय-समय पर नगर में स्वच्छता अभियान जरूर चलाए जाते हैं, लेकिन कई बार यह अभियान सफाई से ज्यादा फोटोशूट बनकर रह जाता है।
नेता जी आते हैं, झाड़ू उठाते हैं, दो मिनट तक सफाई का अभिनय करते हैं, मुस्कुराते हैं, कैमरे के सामने “स्वच्छता का संदेश” देते हैं और फिर… स्वच्छता अभियान वहीं समाप्त हो जाता है।
कटाक्ष यह है कि—
कचरा नदी में बहता रहता है, लेकिन तस्वीरें सोशल मीडिया में बहने लगती हैं।
स्वच्छता का मतलब अगर सिर्फ इतना ही रह गया कि “झाड़ू पकड़कर फोटो खिंचवा लो”, तो फिर चंद्रभागा और जाम नदी जैसी नदियां कब साफ होंगी?
जनता यह भी कहती है कि—
अगर नदियों की गंदगी भी कैमरे में दिखने लगे, तो शायद सफाई अभियान वहां भी पहुंच जाए।


कागजों में स्वच्छता, हकीकत में गंदगी
स्वच्छता योजना में नगर को नंबर मिल जाते हैं, सम्मान मिल जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चंद्रभागा और जाम नदी में जमा प्लास्टिक देखकर लगता है कि स्वच्छता केवल फाइलों में चमक रही है, जमीन पर नहीं।
नगरवासियों का सवाल है—
जब स्वच्छता अभियान चल ही रहा है, तो फिर नदियों को क्यों नजरअंदाज किया जा रहा है?
क्या नदी और नाले स्वच्छता के दायरे से बाहर हैं?
*अब जरूरत है सख्ती और जिम्मेदारी की*नागरिकों को भी अपना कर्तव्य समझना होगा*
अब केवल भाषण, नारे और फोटो से काम नहीं चलेगा। आवश्यकता है कि –
नदी और नालों में कचरा फेंकने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो,नगर पालिका द्वारा नियमित रूप से सफाई अभियान चलाया जाए,प्लास्टिक उपयोग पर प्रभावी नियंत्रण हो।
नेताओं और जनप्रतिनिधियों को भी फोटो से आगे बढ़कर स्थायी व्यवस्था बनानी होगी।नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
*अंततः*
पांढुर्णा सच में सुंदर नगर है, और इसकी नदियां भी सुंदर हैं।
लेकिन आज चंद्रभागा और जाम नदी में फैली गंदगी ने नगर की सुंदरता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
अगर अब भी स्वच्छता अभियान सिर्फ “फोटो खिंचवाने” तक सीमित रहा, तो आने वाले समय में नगर को यह कहना पड़ेगा कि—
“स्वच्छ पांढुर्णा, सुंदर पांढुर्णा”
नारा तो अच्छा था…
लेकिन नदियों में बहता प्लास्टिक और नेताओं की मुस्कुराती तस्वीरों ने इसे केवल दिखावा बना दिया।

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