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पांढुरना में शिक्षा का दीपक

घोरमाडे परिवार ने दान और संस्कार से रचा इतिहास

*पांढुर्णा में शिक्षा का दीपक: घोरमाडे परिवार ने दान और संस्कार से रचा इतिहास*
संवाददाता धनंजय जोशी
जिला पांढुरना मध्य प्रदेश
पांढुर्णा | यह सच ही कहा गया है कि व्यक्ति भले ही इस दुनिया से चला जाए, लेकिन उसके संस्कार, विचार और कर्म समाज में अमिट छाप छोड़ जाते हैं। ऐसा ही प्रेरक उदाहरण पांढुर्णा विकासखंड के भंदारगोंदी गांव में देखने को मिला, जहाँ तिरोले कुनबी समाज के प्रतिष्ठित मार्गदर्शक एवं शिक्षा जगत के स्तंभ स्वर्गीय श्री गणपति दौलतराव घोरमाडे (गुरुजी) की पुण्य स्मृति में उनके परिवार ने शिक्षा सेवा की ऐसी मिसाल पेश की, जो वर्षों तक लोगों को प्रेरित करती रहेगी।


*एक परिवार, एक विचार, शिक्षा को समर्पित पूरा जीवन*
स्व. गणपति घोरमाडे गुरुजी का जीवन स्वयं शिक्षा और संस्कार का पर्याय रहा। उनके विचारों और आदर्शों को उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कविता घोरमाडे ने न केवल जीवित रखा, बल्कि उन्हें समाज के सामने आदर्श रूप में प्रस्तुत भी किया। स्वयं शिक्षिका रहीं श्रीमती घोरमाडे और उनकी पाँचों बेटियाँ—अनिमा, महिमा, चेतना, माधवी एवं वैशाली—आज शिक्षक एवं प्रोफेसर के रूप में समाज को ज्ञान का प्रकाश दे रही हैं।


यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पांढुर्णा जिले में यह संभवतः पहला ऐसा परिवार है, जिसकी पूरी पीढ़ी ने शिक्षा को ही अपना जीवन उद्देश्य बनाया हो। यह परिवार आज शिक्षा के क्षेत्र में समर्पण, त्याग और सेवा का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
*जिस स्कूल से सीखी विद्या, उसी को संवारने का संकल्प*
भावुक कर देने वाला क्षण तब देखने को मिला, जब स्व. गुरुजी की स्मृति में उनकी पत्नी द्वारा उसी भंदारगोंदी शाला को दान दिया गया, जहाँ कभी गुरुजी ने स्वयं अक्षर ज्ञान प्राप्त किया था। इस दान ने स्कूल की तस्वीर और बच्चों के भविष्य—दोनों को संवारने का काम किया।
*विद्यालय को निम्न महत्वपूर्ण* शैक्षणिक सामग्री प्रदान की गई—
16 जोड़ी डेस्क-बेंच, जिससे बच्चों को अब टाट-पट्टी पर बैठने की मजबूरी नहीं रहेगी।
2 बड़ी अलमारियाँ, जो विद्यालय में पुस्तकालय और शिक्षण सामग्री के सुव्यवस्थित भंडारण का आधार बनेंगी।
100 से अधिक विद्यार्थियों को कंपास बॉक्स वितरित किए गए।
मेधावी छात्रों को विशेष पुरस्कार, जिससे बच्चों में आगे बढ़ने की प्रेरणा जागृत हुई।
दान पाकर बच्चों के चेहरों पर जो मुस्कान दिखाई दी, वह गुरुजी के संस्कारों की सच्ची श्रद्धांजलि थी।


*शिक्षा विभाग और ग्रामीणों ने की सराहना*
इस प्रेरणादायक आयोजन में खंड शिक्षा अधिकारी एवं विद्यालय के प्राचार्य श्री राजू वानखेड़े विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने घोरमाडे परिवार की इस पहल को “ऐतिहासिक, अनुकरणीय और समाज के लिए मार्गदर्शक” बताया।
कार्यक्रम में ग्राम सरपंच, उपसरपंच श्री घोटे सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणजन और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।
प्राचार्य ने भावुक शब्दों में कहा कि “गुरुजी की स्मृति को जीवित रखने का इससे श्रेष्ठ और पवित्र तरीका कोई और नहीं हो सकता। यह दान आने वाली पीढ़ियों को भी शिक्षा के प्रति प्रेरित करता रहेगा।”
*समाज के लिए संदेश*
घोरमाडे परिवार की यह पहल केवल एक दान नहीं, बल्कि यह संदेश है कि यदि प्रत्येक परिवार शिक्षा को प्राथमिकता दे, तो गांव, जिला और समाज—तीनों का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। पांढुर्णा की धरती पर रची गई यह शिक्षा-गाथा आने वाले समय में प्रेरणा का स्तंभ बनी रहेगी।

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