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अरे रे… लतीष, तुम ऐसे कैसे चले गए…?

जिंदादिल पत्रकार लतिश जैन इन्का स्वर्गवास

जीवन में मैंने हमेशा बुज़ुर्ग मित्र बनाए, कुछ हमउम्र भी हैं और कुछ मुझसे पंद्रह–बीस–तीस वर्ष छोटे भी। संख्या चाहे कितनी भी हो, लेकिन मित्र को जो दर्जा दिया है, उसे मैंने कभी गिरने नहीं दिया। ऐसा ही एक होनहार, मेहनती, स्नेही और अत्यंत गंभीर स्वभाव वाला मित्र—जो मुझसे लगभग सोलह–सत्रह वर्ष छोटा था। मूलतः वेळोदे निवासी… एकनिष्ठ, किंतु थोड़ा खट्टे स्वभाव का, रांगड़ी प्रवृत्ति वाला—लतीष भंवरलाल जैन।

 

दिखने में—मानो किसी संपन्न घराने का पहलवान; व्यापारी परिवार में जन्म लेकर भी अत्यंत निस्वार्थ और विनम्र। अपने चचेरे भाई गौतम जैन के माध्यम से वह मेरे संपर्क में आया और दिल का बेहद करीब हो गया। दो–तीन बार कुछ वैचारिक मतभेद भी हुए, लेकिन हाल ही में जब मैं चोपड़ा गया था, तो आशा टॉकीज के पास चौधरी होटल में बैठकर हम दोनों फूट-फूटकर रोए। उसने अपनी गलती मानी, मैंने अपनी बात समझावून कही और उसे ढांढस बंधाया। तभी से वह फोन पर लगातार संपर्क में था। घर–परिवार जैसे रिश्ते जोड़ लेने वाला यह लतीष, चोपड़ा आने से पहले वेळोदे में देशदूत सहित अन्य समाचार पत्रों का एजेंट था।

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उसने उस क्षेत्र में घर–घर में पढ़क बनवाए, सैकड़ों अंक की बिक्री बढ़ाई और वितरण का मजबूत व्यवसाय खड़ा किया। तभी उसे चोपड़ा आने की इच्छा जागी। कुसुंबा के परिचित और केरोसिन होलसेलर आर. एस. पाटील के चोपड़ा बस स्टैंड के पीछे वाले घर में वह अपने भाई, परिवार और मातोश्री के साथ रहने आया। चोपड़ा में देशदूत के प्रसार में वृद्धि करने में धुले संस्करण के माध्यम से हमने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद जळगाव संस्करण शुरू हुआ। इस दौरान उसने परिचय बढ़ाकर मित्र मंडली और पाठक संख्या भी बढ़ाई।

 

धीरे–धीरे अन्य समाचार पत्र भी एजेंसी के लिए उसके पास आने लगे। लिखने का शौक—इससे पत्रकार बनने की भावना—और उसने पत्रकारिता क्षेत्र चुन लिया। हाथ में कोई भी काम हो, वह करने को तैयार रहता। रात्रि में जकात नाका पर काम करते हुए उसने अपना संपर्क और जनसंपर्क भी बढ़ाया। एजेंसी, पत्रकारिता और अन्य कार्य—यह सब मिलाकर उसने और उसके बड़े भाई सुनील ने चोपड़ा में अपना व्यवसाय दृढ़ता से स्थापित किया।

 

माता गेंदाबाई मेहनती और परिश्रमी—उनके हाथों के सभी प्रकार के पापड़ घोडगांव क्षेत्र में प्रसिद्ध थे। वही परंपरा सुनील और लतीष ने भी आगे बढ़ाई। आगे चलकर उसने कुछ दिशाएँ बदलीं और हमसे अलग होकर नए मित्रों के साथ दैनिक प्रकाशन और प्रेरणा दर्पण संस्था के माध्यम से काम किया—परंतु मित्रता कायम रही। किसी भी समस्या में वह संपर्क अवश्य करता।

 

हमारी प्रिंटिंग प्रेस की प्रगति का साक्षी लतीष और हमारा मित्र समूह रहा है। साप्ताहिक साथीदार और अन्य दैनिक प्रतिनिधित्व में हमने जो दायरा बनाया—उसे उसने निकट से देखा। दैनिक दणकेबाज के दौरान जो कठिनाइयाँ हमने झेलीं, उनसे सीखकर वह अक्सर कहा करता—“भाऊ, यह काम समूह का नहीं, व्यक्ति–केंद्रित है। सहयोग सबका लो, पर नियंत्रण एक ही हाथ में हो।” केवल लगभग पचास वर्ष की उम्र, पर अनुभव मानो किसी परिपक्व व्यक्ति जैसा।

 

इवेंट मैनेजमेंट उसकी नसों में बसता था। टीटीएमएम पार्टी—जब भी मन में आता—हम सब शुद्ध शाकाहारी जैन फूड के साथ खूब आनंद करते। ऑर्डर करना, मिमिक्री करना—सब लतीष ही करता। हँसते–हँसते वह मौत को भी गले लगा गया…

 

मेरे जन्मदिन पर पौन घंटे फोन पर बोला… सारी हालचाल ली… सबको हँसाया… और बोला—“दिवाली पर नहीं, नागदिवाली पर ज़रूर नाशिक आऊँगा।”

अरे मित्र लतीष, नागदिवाली तो आ गई…

पर तुम बिना बताए ऐसे कैसे चले गए…?

 

सारा मित्र परिवार तुम्हारी राह देख रहा है…

एक हरफनमौला मित्र खो गया… यह निश्चित है।

अब श्रद्धांजलि देने के अलावा क्या शेष रह गया…

 

अविस्मरणीय… नि:शब्द…

ओम् शांति।

 

— अनिलकुमार पालीवाल, वरिष्ठ पत्रकार, चोपड़ा

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