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खाटूश्याम और खान्देश का प्राचीन संबंध

एक

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से रोचक प्रवास

राजस्थान के प्रसिद्ध खाटू श्याम बाबा आज देश-विदेश में करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र बन चुके हैं। “हारे का सहारा” के रूप में पूजित यह देवता वर्तमान समय में विशेष लोकप्रियता प्राप्त कर रहे हैं। खानदेश से प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए निकलते हैं। लेकिन क्या खाटू श्याम का खानदेश से कोई ऐतिहासिक संबंध है?

इस प्रश्न का उत्तर है — हाँ, और वह संबंध अत्यंत रोचक है।

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महाभारत काल की कथा और खानदेश का भूगोल

 

कथा का आरंभ महाभारत के उस प्रसंग से होता है जब दुर्योधन ने पांडवों को लाक्षागृह में जीवित जलाने का षड्यंत्र रचा। वहां से बचकर पांडव जिस खांडव वन में आए, वह क्षेत्र ही आज का खानदेश माना जाता है। महाभारत में वर्णित एकचक्रनगरी को वर्तमान एरंडोल से जोड़ा जाता है।

 

एरंडोल पहुंचने से पहले पांडवों ने जरंडी के निकट स्थित प्राचीन जंजाला किले में भी निवास किया। इसी क्षेत्र में भीम और राक्षसी हिडिंबा का विवाह हुआ। उनके पुत्र घटोत्कच का जन्म भी इसी खानदेशी भूभाग में हुआ।

 

 

 

घटोत्कच से बर्बरीक तक — खानदेश का गौरव

 

घटोत्कच का विवाह राक्षसराज मुरासूर की पुत्री अहिलावती से हुआ। उनके तीन पुत्र हुए —

बर्बरीक, मेघवर्ण और अंजनपर्व।

 

मेघवर्ण, महाभारत युद्ध में कर्ण के हाथों वीरगति को प्राप्त हुआ।

 

अंजनपर्व आगे चलकर जंजाला किले का शासक बना। उसके नाम पर ही पास का गाँव झेंडेअंजन जाना जाता है।

 

 

इस प्रकार घटोत्कच का कुल खानदेश की भूमि से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। सोयगांव तालुका प्रशासनिक रूप से संभाजीनगर जिले में आता है, परंतु भाषिक और सांस्कृतिक दृष्टि से वह संपूर्णतः खानदेशी परंपरा का अंग माना जाता है।

 

 

 

बर्बरीक — वही वीर जो आगे चलकर ‘खाटू श्याम’ कहलाया

 

तीनों भाइयों में बर्बरीक सबसे शक्तिशाली था। वह अद्वितीय धनुर्धर और शिव व काली का कठोर उपासक था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे तीन अमोघ बाण दिए, जिनके बल पर वह तीनों लोकों का विनाश करने में सक्षम हो गया था।

 

उसकी माता अहिलावती ने उसे दीन-दुबले, कमजोर और पराजित लोगों की सहायता करने का उपदेश दिया। बर्बरीक ने वचन दिया कि वह सदैव हारने वाली सेना का साथ देगा। यही प्रतिज्ञा आगे चलकर महाभारत के युद्ध में एक बड़े संकट का कारण बनने वाली थी।

 

 

 

कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान और श्रीकृष्ण की परीक्षा

 

जब महाभारत युद्ध आरंभ हुआ, बर्बरीक खानदेश से कुरुक्षेत्र के लिए निकल पड़ा। श्रीकृष्ण समझ गए कि यदि बर्बरीक युद्धभूमि में गया तो उसकी प्रतिज्ञा के कारण वह कभी भी युद्ध के संतुलन को उलट सकता है। परिणामस्वरूप दोनों ही सेनाएँ नष्ट हो जातीं और अंत में केवल बर्बरीक अकेला बचता।

 

संभावित विनाश को देखते हुए श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में उससे भेंट की और उसके तीन बाणों की शक्ति को परखने का प्रयत्न किया। बर्बरीक ने एक ही बाण से पीपल वृक्ष के सभी पत्तों को भेद दिया—even वे पत्ते भी जो कृष्ण के चरणों के नीचे छिपे थे। इस चमत्कारिक कौशल से श्रीकृष्ण भी दंग रह गए।

 

 

 

श्रीकृष्ण द्वारा शीशदान की मांग

 

भविष्य के संहार को रोकने के लिए श्रीकृष्ण ने उससे उसका शीश दान माँगा। दिव्य दृष्टि से पहचान कर कि यह ब्राह्मण कोई और नहीं बल्कि उनके पितामह श्रीकृष्ण स्वयं हैं, बर्बरीक ने बिना क्षण भर का विलंब किए अपना शीश अर्पित कर दिया।

 

परंतु उसने एक इच्छा प्रकट की—

“मैं सम्पूर्ण महाभारत युद्ध देखना चाहता हूँ।”

 

कृष्ण ने उसका शीश कुरुक्षेत्र की एक ऊँची टेकरी पर तीन बाणों के नोक पर स्थापित किया और वर दिया—

 

“कलियुग में तुम ‘श्याम’ नाम से पूजित होगे।

तुम हारे हुए हर व्यक्ति के सहारा बनोगे।”

 

 

 

शीश का खाटू पहुँचना और मंदिर की स्थापना

 

युद्ध समाप्ति के पश्चात कृष्ण ने विधिपूर्वक अंतिम संस्कार कर शीश को रुपमती नदी में प्रवाहित किया। वह शीश बहता-बहता राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गाँव में पहुंचा, जहाँ वह वर्षों तक मिट्टी में दबा रहा। एक गाय प्रतिदिन उस स्थान पर दूध की धारा बहाती थी। इस चमत्कार से प्रभावित ग्रामीणों ने खुदाई की और वहीं बर्बरीक का दिव्य शीश प्राप्त हुआ।

 

इसी स्थान पर आज भव्य खाटू श्याम मंदिर स्थित है, जिसे लगभग एक हजार वर्ष से अधिक प्राचीन माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि श्याम बाबा नवस को पूर्ण करते हैं और हारे हुए लोगों के कल्याणकर्ता हैं।

 

हरियाणा के हिसार जिले के स्याहडवा गाँव में बर्बरीक के धड़ की पूजा होती है।

 

 

 

खानदेश में भी खाटू श्याम की आराधना

 

सिंदखेडा तालुका के कुरुकवाड़े गाँव में भी खाटू श्याम बाबा का सुसज्जित मंदिर है। वहाँ स्थापित मूर्ति राजस्थान की मूल मूर्ति से अत्यंत मिलती-जुलती है। राजस्थान न जा पाने वाले भक्त यहाँ दर्शन कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

 

 

 

निष्कर्ष

 

खाटू श्याम बाबा की कथा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि खानदेश और महाभारतकालीन इतिहास का अनिवार्य अंग भी है। बर्बरीक—खानदेश का यह अद्वितीय वीर—आज ‘हारे का सहारा’ बनकर असंख्य लोगों की श्रद्धा का केंद्र है।

 

जय खाटू श्याम बाबा!

जयखान्देश.

संकलन: अनिलकुमार पालीवाल, ज्येष्ठ पत्रकार

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