

भारतीय जनता पार्टी को आज देश और राज्य में “अच्छे दिन” मिले हैं, लेकिन एक समय था जब पार्टी के लिए कार्यकर्ता मिलना भी कठिन होता था। ऐसे समय में जिन्होंने नासिक में पार्टी को मज़बूती दी, उनमें वरिष्ठ कार्यकर्ता और पूर्व नगरसेवक सतीश शुक्ल का नाम अग्रणी रूप से लिया जाता है। जनसंघ, जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी—इन तीनों कालखंडों के साक्षी आज बहुत कम लोग जीवित हैं, और शुक्ल जी उनमें से एक हैं। उनका जन्मदिन 21 अक्टूबर को, यानी दीपावली के दिन आता है—यह मानो दुग्ध-शर्करा योग है। उनके जन्मदिन के अवसर पर उनके कार्यों का यह संक्षिप्त परिचय।
नासिक के प्रतिष्ठित पुरोहित के रूप में सतीश शुक्ल का नाम पूरे राज्य में प्रसिद्ध है। तीर्थक्षेत्रों के विकास में उनका योगदान, हर कुंभ मेले में निधि लाने और आयोजन को सफल बनाने के उनके प्रयास अतुलनीय हैं। गंगा गोदावरी महाआरती का अखंड आयोजन जारी रहे, रामकुंड क्षेत्र में स्वच्छ और निर्मल जल बना रहे—इसके लिए वे हमेशा तत्पर रहते हैं।
भाजपा के सभी आंदोलनों में उन्होंने सक्रिय सहभाग लिया है। अयोध्या आंदोलन में वे अग्रभाग में थे। नासिक से अयोध्या कारसेवक के रूप में गए थे। वे गर्व से कहते हैं कि “जब बाबरी मस्जिद गिरी, तब मैं गर्भगृह में था।” बिना में जब कारसेवकों को गिरफ्तार किया गया था, तब उन्होंने गनिमी कावा की तरह सैकड़ों मील पैदल चलकर अयोध्या पहुँचने का संकल्प पूरा किया। कश्मीर में डोडा बचाव आंदोलन के दौरान लाल चौक पर तिरंगा फहराने में उन्होंने जीवन का जोखिम उठाया।
जब लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा नासिक आई, तब सतीश शुक्ल को उनके अंगरक्षक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। सतीश जी का जन्म नासिक के एक पुरोहित परिवार में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पुराने नासिक की 11 नंबर स्कूल और रुंगठा विद्यालय में हुई। इसी विद्यालय से शिक्षित अनेक छात्र आगे चलकर राजनीति और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में चमके, शुक्ल जी भी उन्हीं में से एक थे।
वे इंटरसाइंस तक शिक्षित हैं, परंतु पिता की पौरोहित्य सेवा में हाथ बँटाने के लिए उन्हें पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी। आज तक वे उसी पेशे में समर्पित हैं और नासिक के ब्राह्मवृंदों में उनका नाम आदरपूर्वक लिया जाता है। नासिक में जब भी किसी दल के नेता धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, तो सबसे पहले सतीश शुक्ल का नाम लिया जाता है—यही उनका सच्चा सम्मान है।
देश के विभिन्न राज्यों के राजघरानों—म्हैसूर, तंजावूर, हिमाचल, आंध्र, राजस्थान, उत्तराखंड—के वे कुलोपाध्याय हैं। टाटा, बिड़ला, खेतान, झुनझुनवाला, पिरामल, गोयन्का, सिंघानिया जैसे उद्योगपतियों के भी वे कुलपुरोहित हैं। उनके पास 700 वर्षों की वंशावली का रिकॉर्ड है, और वे 12 पीढ़ियों के प्रमुखों के नाम स्मरण से सुना सकते हैं।
गंभीर आवाज़, स्पष्ट उच्चारण, विषयों का गहन ज्ञान और उत्कृष्ट वक्तृत्व कौशल—इन गुणों के कारण उन्होंने अनेक चुनावी सभाओं में प्रभावशाली भाषण दिए। 1992 में जब नासिक महानगर पालिका की पहली चुनावी प्रक्रिया हुई, तब भाजपा के दस पार्षदों में सतीश शुक्ल भी शामिल थे। उन्होंने सभागृह में अनेक मुद्दों पर जोरदार आवाज़ उठाई।
एक आक्रमक और जनपक्षीय नगरसेवक के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। त्र्यंबकर रोड पर स्थित स्विमिंग पूल का नाम “स्वातंत्र्यवीर सावरकर” रखने की मांग करते समय, जब सभागृह में हंगामा हुआ, तो उन्होंने महापौर के हौद में उतरकर राजदंड उठा लिया और अंततः अपनी मांग मनवा ली। इसी तरह अग्निशमन विभाग के कार्यालय को “वीर बापू गायधनी” तथा सीबीएस चौक को “क्रांतीवीर अनंत कान्हेरे” का नाम देने के प्रस्ताव पर वे अडिग रहे।
नगरसेवक के पांच वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने कई उल्लेखनीय कार्य किए—भद्रकाली चौक में साक्षी मंदिर की स्थापना, जीर्ण 11 नंबर विद्यालय का नवीनीकरण, कलिदास कला मंदिर से तिवंध्या तक आठ इंच की जलवाहिनी डालकर जल समस्या का समाधान, भद्रकाली में धान्य व्यापारियों के लिए संकुल निर्माण, और नेहरू चौक के सुंदर पार की स्थापना, जहाँ अब “पाडवा पहाट” जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलाने में भी उनका योगदान रहा।
उनकी कार्यकुशलता को मान्यता देते हुए कै.वि.वा. शिरवाडकर (कुसुमाग्रज) और सरकारी वकील उज्जवल निकम की समिति ने उन्हें “आदर्श नगरसेवक पुरस्कार” से सम्मानित किया।
सतीश शुक्ल के निरंतर प्रयासों से नासिक कुंभक्षेत्र में गोदातट पर महाआरती आरंभ हुई, जिसके लिए महाराष्ट्र शासन ने हाल ही में 10 करोड़ रुपये मंजूर किए—यह नासिकवासियों के लिए गर्व की बात है।
वे 1977 से संघ परिवार से जुड़े हुए हैं। जनसंघ, जनता पार्टी और बाद में भारतीय जनता पार्टी के साथ वे आज भी निष्ठापूर्वक जुड़े हैं। 1980 में मुंबई में भाजपा की स्थापना के कार्यक्रम में उन्होंने भाग लिया था। उस समय पार्टी में कार्यकर्ताओं को जुटाना कठिन कार्य था। 1984 की लोकसभा चुनाव में तो भाजपा कार्यकर्ताओं को “कमल दिखाओ और हजार रुपये पाओ” जैसी उपहासजनक बातें सुननी पड़ती थीं। लेकिन शुक्ल जी ने कठिन समय में भी संगठन का कार्य निष्ठा से किया।
वे आठ वर्ष तक भाजपा के महानगर उपाध्यक्ष और चार वर्ष तक चिटणीस रहे। भाजपा राज्य परिषद के सदस्य भी रहे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया से लेकर रामभाऊ म्हाळगी, प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे, नितिन गडकरी, प्रकाश जावड़ेकर और प्रा. न. स. फरांदे जैसे दिग्गज नेताओं के सान्निध्य का उन्हें सौभाग्य मिला।
स्थानीय स्तर पर बंडोपंत जोशी, डॉ. दौलतराव आहेर, नितिनभाई जोशी, बिर्दीचंद नाहर, पोपटराव हीरे, गणपतराव काठे, डॉ. डोंगरे और हुकुमचंद बागमार जैसे नेताओं के साथ उन्होंने कार्य किया।
वे भाजपा तीर्थक्षेत्र आघाड़ी के अध्यक्ष भी रहे। गौ-रक्षा के लिए आज भी रात में उन्हें फोन आते हैं, और उन्होंने अनेक बार संघर्ष करके गोवंश की हत्या रुकवाई है।
वे कुशल तैराक हैं। बाढ़ के समय पुलों से गोदावरी में छलांग लगाकर कई लोगों की जान बचाई। प्रारंभिक वर्षों में जब पार्टी कमजोर थी, तब उन्होंने अनेक आयोजन किए। उस समय भाजपा कार्यालय मुँदड़ा मार्केट में था, जहाँ मुरमुरे के बोरे रखे रहते थे—उसी पर कार्यकर्ता बैठते थे। बाद में कार्यालय हुंडीवाला लेन में गया, और आज एन. डी. पटेल रोड पर विशाल भवन में स्थित है।
पार्टी के प्रारंभिक काल में शुक्ल जी ने जो टेलीफोन (क्रमांक 0253-598156) उपलब्ध कराया था, वह आज भी भाजपा कार्यालय में कार्यरत है और बिल उनके नाम से आता है।
सामाजिक कार्यों में भी वे अग्रणी रहे हैं। 100 वर्ष पुरानी गुलालवाडी व्यायामशाला के अध्यक्ष, पुरोहित संघ तथा शुक्ल यजुर्वेदीय माध्यंदिन ब्राह्मण संस्था के अध्यक्ष के रूप में वे लंबे समय से दायित्व निभा रहे हैं। अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने नासिक में महासभा का अधिवेशन सफलतापूर्वक आयोजित किया, जिसमें काशी, हरिद्वार, मथुरा, वृंदावन, रामेश्वर, सोमनाथ, उज्जैन आदि स्थानों के पुरोहित शामिल हुए।
गंगा गोदावरी महाआरती के सतत आयोजन हेतु उन्होंने करोड़ों का निधि प्राप्त कराया और कुंभमेले के लिए नासिक को पर्याप्त अनुदान मिले, इसके लिए सदैव प्रयत्नशील रहे।
कोविड लॉकडाउन के दौरान उन्होंने राजमार्ग पर पैदल जाते प्रवासी मजदूरों के लिए रोजाना गर्म खाना, रोटी-सब्ज़ी, खिचड़ी, स्वच्छ पानी और बिस्कुट का निःशुल्क वितरण कराया।
उनका बेटा प्रतिक शुक्ल उच्चशिक्षित है, भाजपा मध्य मंडल का सरचिटणीस और सोशल मीडिया प्रभारी है। उनकी पुत्रवधू सौ. कीर्ति शुक्ल कथक में “अलंकार परीक्षा” उत्तीर्ण कर अब पीएच.डी. कर रही हैं, और “नृत्यानंद” संस्था के माध्यम से नासिक की अनेक छात्राओं को प्रशिक्षित कर कला क्षेत्र में योगदान दे रही हैं।
उनके दामाद प्रसाद काठे “जय महाराष्ट्र” न्यूज़ चैनल के मुख्य संपादक हैं।
सतीश शुक्ल का 21 अक्टूबर को 70वाँ जन्मदिन है। अब तक का उनका जीवन सुख और संतोष से व्यतीत हुआ है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उन्हें आने वाले वर्षों में भी निरोग, दीर्घ और आनंदमय जीवन का वरदान मिले।
– प्रियदर्शन टांकसाळे
वरिष्ठ पत्रकार
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