
रिपोर्टर राजकुमार हमीरपुर अखंड भारत
मौदहा हमीरपुर।परसदवा डेरा गऊघाट छानी, मौदहा विकासखंड जंगलों की घनी छांव में बसी इस छोटी-सी बस्ती में शनिवार को घटी एक घटना ने मानवता को झकझोर दिया। प्रसव वेदना से तड़पती 23 वर्षीय रेशमा को उसके ससुर कृष्ण कुमार केवट ने बैलगाड़ी पर लादकर कीचड़ भरी दलदली पगडंडी से अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की। इस दर्दनाक सफर में रेशमा के कपड़े तक कीचड़ में सने गए, जबकि रास्ते की फिसलन हर कदम पर मौत की आहट जैसी थी।
बेटे हरिपाल की गैरमौजूदगी में 60 वर्षीय ससुर ने साहस जुटाया और बहू को पुराने बैलगाड़ी पर लिटाकर अस्पताल की ओर रवाना हुए। गांव से सिसोलर अस्पताल की दूरी महज 7 किलोमीटर थी, पर यह दूरी कीचड़ और दलदल में घंटों की जद्दोजहद में बदल गई। हर झटके पर रेशमा की चीखें जंगल को चीरती रहीं — “ससुर जी, अब सहा नहीं जाता…” जंगली झाड़ियां और कंटीले पौधे रास्ता रोकते रहे, मगर कृष्ण कुमार ने हिम्मत नहीं हारी।
“अगर एम्बुलेंस यहां तक पहुंच पाती तो ये हाल न होता,” थकी आवाज में कृष्ण कुमार ने कहा। “यह रास्ता जानलेवा है। हर बरसात में गाड़ी फंस जाती है, और मरीज को उठाकर लाना पड़ता है।”
रेशमा को अंततः सिसोलर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसकी जांच कर बताया कि प्रसव की तिथि अभी दो दिन बाद की है। इलाज के बाद उसे वापस घर भेज दिया गया।
लेकिन रेशमा की यह पीड़ा पूरे डेरा की कहानी कहती है — करीब 500-600 ग्रामीण इसी दलदली रास्ते के सहारे जिंदगी जी रहे हैं। बरसात में गांव का संपर्क टूट जाता है, जंगली जानवरों का खतरा बढ़ जाता है और जरूरत के वक्त इलाज तक पहुंचना नामुमकिन हो जाता है।
यह पहला मामला नहीं है। 12 मार्च 2024 को ग्राम पंचायत के युवा समाजसेवी राजेंद्र कुमार (अरुण निषाद) ने इसी सड़क के निर्माण की मांग को लेकर छह दिन का अनिश्चितकालीन धरना दिया था। प्रशासन ने उपजिलाधिकारी रमेशचंद्र के माध्यम से आश्वासन दिया था कि लोकसभा चुनाव के बाद सड़क बनवायी जाएगी। पर आज तक न सड़क बनी, न वादा पूरा हुआ।
चिट्ठियां लिखीं, अधिकारियों से मिले, पर कोई सुनवाई नहीं हुई,” अरुण निषाद ने कहा। “जब तक सड़क नहीं बनेगी, रेशमा जैसी और कितनी जिंदगियां संकट में पड़ेंगी?”
अब ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर, स्थानीय विधायक और मुख्यमंत्री कार्यालय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि एक पक्की सड़क सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की डोर है।
प्रशासन कब जागेगा — इससे पहले कि इन चीखों की गूंज चुप हो जाए?

