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मानव जीवन में मिली इस कंचन काया को भगवान के ज्ञान गंगा में स्नान कराओ

पंडित हरि नारायण वैष्णव का प्रतिपादन

श्री क्षेत्र शुक्रताल (अनिलकुमार पालीवाल) मानव जीवन एक दिव्य देन है और इस जीवन में मिली कंचन काया को भक्ति रस और भगवान की ज्ञान गंगा में स्नान कराओ, ऐसा प्रतिपादन सुप्रसिद्ध कथा व व्याख्यानकार पंडित हरि नारायण वैष्णव ने यहाँ आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के छठे दिन बोलते हुए किया।

 

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यहाँ के श्री शिव धाम परिसर में आयोजित इस कथा का उन्होंने विस्तार से निरूपण किया। कथा में परीक्षित राजा और तोते की कथा प्रस्तुत करते हुए कहा कि जीवन तोते के समान माया रूपी पिंजरे में कैद है, और इसे इस मोह-माया से दूर करने के लिए भक्ति रस और बौद्धिक गंगा में स्नान करना आवश्यक है। तभी जीवन भक्ति मार्ग में समरस हो सकता है, ऐसा उन्होंने विशेष रूप से कहा।

 

जतीपुरा (उत्तर प्रदेश) स्थित श्री गिरिराज धाम पर स्थापित गोवर्धन पर्वत के रहस्य और परिक्रमा की सात्विकता का भी उन्होंने महात्म्य स्पष्ट किया। राधा-कृष्ण के प्रेम रहस्य को बताते हुए कहा कि प्रत्येक गोपी के आँसुओं का मोल अनमोल है। इसलिए भागवत कथा की समाप्ति के बाद भी हमारे बिछड़ने का रहस्य कल प्रत्येक भक्त को भक्ति की शक्ति के महत्व से अनुभव होगा। बांसुरी को प्रेम की निशानी मानकर श्रीकृष्ण ने राधारानी को अर्पित किया, ऐसा भी पंडित जी ने बताया। प्रेम और विरह का दुवा राधाकृष्ण का प्रेम है, उन्होंने ऐसा कहा। इसी प्रकार मोर और कृष्ण के प्रेम का भी उन्होंने अत्यंत रसपूर्ण वर्णन किया।

 

सोन्य की द्वारका का निर्माण कर भगवान श्रीकृष्ण ने प्रजा में सुराज्य स्थापित कर लोककल्याणकारी कार्य किए, यह स्पष्ट किया। रणभूमि में सारथ्य सिद्ध किया। द्रौपदी चीरहरण की विचलित कर देने वाली घटना का वर्णन करते हुए कहा कि जब उसकी साड़ी खींची जा रही थी तब स्वयं परमेश्वर ही काम आए। उसी तरह जब हमारे जीवन की नाड़ी खींची जाएगी तब भी परमात्मा ही काम आएंगे, यह समझना चाहिए। इसलिए जब भी जीवन में हमारी साड़ी और नाड़ी खींची जाएगी तो केवल परमेश्वर ही सहारा देंगे। हर भक्त को नामस्मरण और भक्ति का अनुसरण करना चाहिए, ऐसा उन्होंने अपने प्रवचन के अंतिम चरण में कहा।

 

ईश्वर भक्ति में अग्रणी भक्त के संकट समय में भी परमेश्वर अग्रसर रहते हैं, ऐसा भी उन्होंने दृढ़ता से कहा। भागवत कथा भक्ति और शक्ति के संगम का जीवंत दर्शन कराती है। संघर्ष और न्याय की कृतिशीलता को हमारे जीवन में संजीवनी बनाकर सदैव प्रेरणा देने का कार्य भी श्रीमद्भागवत कथा से होता है, यह भी उन्होंने स्पष्ट किया।

 

कल कथा के समापन का अंतिम पुष्प होगा तथा कल सार्वजनिक भंडारा प्रसाद का वितरण किया जाएगा। आज के छठे पुष्प में भगवान श्रीकृष्ण के रुक्मिणी विवाह का संजीवनी दृश्य प्रस्तुत किया गया। कथा के मुख्य यजमान श्री झाडोत परिवार की ओर से ग्रंथ की आरती की गई।

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