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श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर खूब मस्ती में झूमे श्रोता

श्रीमद् भागवत कथा पांचवां दिन...परमात्मा की प्राप्ति सच्चे प्रेम के द्वारा ही संभव हो सकती है...पंडित प्रवीण शर्मा राधे भैया



रिपोर्टर : दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597

मनावर। जिला धार।। धनवान व्यक्ति वही है जो अपने तन, मन, धन से सेवा भक्ति करे वही आज के समय में धनवान व्यक्ति है। परमात्मा की प्राप्ति सच्चे प्रेम के द्वारा ही संभव हो सकती है। उक्त उदगार ग्राम वायल में पटेल परिवार द्वारा संकल्पित पंचम श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिन पंडित प्रवीण शर्मा राधे भैया ने व्यासपीठ से व्यक्त करते हुए भगवान श्रीकृष्ण बलदाऊ की बाल लीलाओं, गोवर्धन पूजा और कंस वध की कथाओं का वर्णन किया गया। गोवर्धन लीला के माध्यम से अहंकार त्यागने का संदेश दिया गया। श्री कृष्ण की बाल लीलाओं में पूतना वध, धेनुकासुर, कल्या नाग का मर्दन, कंस वध और माखन चोरी जैसी मनोहर बाल लीलाओं का वर्णन किया गया। श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र का अभिमान चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाना। यह लीला प्रकृति पूजा और कर्म प्रधानता का संदेश देती है।

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व्यासपीठ से अहंकार का त्याग करने, सच्चा गुरु बनाने और निष्काम कर्म करने की शिक्षा गई। पंडाल में “जय कन्हैया लाल की” के जयकारों के साथ कृष्ण जन्म की बधाइयाँ बांटी गई। भगवान के गोकुल से मथुरा गमन प्रसंग पर भाव विभोर हुए श्रोता।

इस अवसर पर पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए पंडित प्रवीण शर्मा राधे भैया ने बताया कि पूतना राक्षसी ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी। श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया। व्रजरज का सेवन करके यह दिखला रहे हैं कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी सारी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें हैं वे मेरे कितने प्रिय हैं। भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते हैं। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को पुकारा तब श्रीकृष्ण पृथ्वी पर आये हैं। इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते हैं ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सकें। गोप बालकों ने जाकर यशोदामाता से शिकायत कर दी–’मां तेरे लाला ने माटी खाई है यशोदामाता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आयीं। ‘अच्छा खोल मुख।’ माता के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण ने अपना मुख खोल दिया। श्रीकृष्ण के मुख खोलते ही यशोदाजी ने देखा कि मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। बड़ा विस्मय हुआ माता को। श्री कृष्ण ने देखा कि मैया ने तो मेरा असली तत्त्व ही पहचान लिया है। श्री कृष्ण ने सोचा यदि मैया को यह ज्ञान बना रहता है तो हो चुकी बाललीला, फिर तो वह मेरी नारायण के रूप में पूजा करेगी। न तो अपनी गोद में बैठायेगी, न दूध पिलायेगी और न मारेगी। जिस उद्देश्य के लिए मैं बालक बना वह तो पूरा होगा ही नहीं मगर यशोदा माता तुरन्त उस घटना को भूल गयीं।

पंडित प्रवीण शर्मा राधे भैया ने कहा कि आज कल की युवा पीढ़ी अपने धर्म अपने भगवान को नही मानते है, लेकिन तुम अपने धर्म को जानना चाहते हो तो पहले अपने धर्म को जानने के लिए गीता, भागवत, रामायण पढ़ो तो, तुम नहीं तुम्हारी आने वाली पीढ़ी भी संस्कारी हो जायेगी। कथा में संगीतमय सुमधुर भजनों पर भक्तों ने खूब आनंद लिया जमकर नाचे।

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