
बैतुल मुलताई सिरसावाडी निवासी दयाल जी चौहान जन्म 13.10.1948 जन्मे पेशे से एक शिक्षक थे, और और उन्होंने लगभाग 40 वर्ष तक अपनी सेवा शिक्षक के रूप मे प्रदान की, कई विद्यार्थि का भविष्य सावरा और यहां तक की अपनी देह भी बच्चों के नाम कर दी। जिससे बच्चे कुछ सिख सके और सही कीर्तिमान हासिल कर सके।
*गायत्री परिवार से लगाव*
मां गायत्री शक्तिपीठ से काफी लगव रहां, लगभग 45 वर्ष उन्होंने अपने जीवन काल के गायत्री शक्तिपीठ के नाम सेव दी, जहा जैसा सहयोग बना वहा अपना कर्तव्य निभाया और अपने बच्चों का भविष्य संवारा और अपना समाज मे कीर्तिमान हासिल किया।
*अपने परिवार से लगाव*
दयाल जी चौहान का अपने परिवार से काफी लगांव रहा। उनके दो पुत्र है हेमंत और योगेश दोनो को काफि स्नेह करते थे, उन्होने अपने बच्चो जिवन सवार और उनके उज्जवल भविष्य की हमेशा ईश्वर से कामना करते रहे,भरा पुरा परिवार नाति, नातिन बहुये और, अपनि जिवन सगिनि को छोड कर वह आज बृहमलिन हो गए।
*समाज को सन्देश*
देह दान करना यह निर्णय उन्होने अपने विवेक और परिवार की बता कर लिया, और समाज के मन मे यह चेतना जगाने की कोशिश की व्यक्ति कभी मरता नही उसकी आत्मा अमर रहती है। और अपना शरीर भी किसी का कीर्तिमान बना सकता है।
*देहदान का महत्व*
देहदान का बहुत महत्व है क्योंकि यह चिकित्सा, शिक्षा शोध की तकनीक मे योगदान देता है। देहदान से चिकित्सा छात्रो को मानव जटीलताओ को समझने मे मदद मिलती है, जिस्से वह बेहतर डॉक्टर बन पाते हैं। यह एक बेहतर कार्य है जो भविष्य मे जीवन बचाने और लोग, के स्वास्थ्य सुविधारने मे काफि मदद करता है। इसी लिए शिक्षक दयाल जी चौहन ने एक शिक्षक होने के नाते अपनी देह दान कर, अपनी मां ताप्ती की नगरी मुलताई का नाम रोशन कर दीया।
