

हमीरपुर से ब्यूरो चीफ राजकुमार की रिपोर्ट
मौदहा हमीरपुर। कहने को तो हमीरपुर की मौदहा तहसील में पूर्ण रूप से दलालों का प्रवेश वर्जित है लेकिन यहां की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। हालांकि यहां तहसील परिसर के विभिन्न पटलों पर बड़े-बड़े बैनर तथा दीवारों पर दलालों का प्रवेश वर्जित, रिश्वत लेना देना अपराध जैसे दीवार लेखन तहसील परिसर की शोभा बढ़ा रहे हैं। लेकिन जब आप यहां पहुंचेंगे तो निश्चित रूप से ही आपको अधिकारियों से पहले कई प्राइवेट व्यक्ति विभिन्न कामों को कराने का दम भरते पैसों की मांग करते नजर आएंगे। इतना ही नहीं अगर आपको खेतों की पैमाइश भी करानी है तो आपको लेखपालों को खर्च देकर प्राइवेट व्यक्तियों से सिफारिश लगानी पड़ेगी जो आपको पुरानी तहसील के गेट स्थित नीम के पेड़ के नीचे मंडराते हुए मिलेंगे। ऐसा कस्बे के संभ्रांत एवं बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों का मानना है। हालांकि इस सबसे इतर तहसीलदार तहसील परिसर में बिना दलाली, रिश्वतखोरी जैसी बातों को ध्यान देने में जोर देने की बात कह रहे हैं।
मौदहा तहसील परिसर में व्याप्त भ्रष्टाचार, कमीशन खोरी, दलाली सहित विभिन्न क्रियाकलापों की गाथा का समय-समय पर वर्णन किया जाता जा रहा है लेकिन समय-समय पर यहां तैनात उच्च अधिकारी तहसील परिसर को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने में जोर देने की बात करते आ रहे हैं। मौजूदा समय में तहसील परिसर में व्याप्त भ्रष्टाचार के खेल में सुबह से लेकर देर शाम तक प्राइवेट व्यक्ति राजस्व विभाग के लेखपालों, कानून गो सहित अन्य विभागीय लोगों के लिए सोने की खान खोद रहे हैं। तहसील परिसर में व्याप्त भ्रष्टाचार की गाथा समय समय पर दूर दराज से तहसील पहुंचने वाले लोगों से सुनने को मिलती है लेकिन इन निर्धन वर्ग के लोगों की सुनने वाला शायद वहां कोई नहीं है। तहसील परिसर को भ्रष्टाचार मुक्त और कमीशनखोरी मुक्त दिखाने के लिए परिसर की दीवारों पर चिपके पोस्टर, दीवार लेखन वहां शोभा वर्धक तो साबित होंगी लेकिन हकीकत कुछ और ही है। यदि आम जनमानस को खेतों की पैमाइश, वसीयत, खसरा, खतौनी, इत्यादि के सत्यापन हेतु लेखपालों से मिलना हो तो आमजन बिना प्राइवेट व्यक्तियों के नहीं मिल सकते। हालांकि उक्त प्राइवेट व्यक्ति पुरानी तहसील के गेट स्थित नीम के पेड़ के नीचे अपना डेरा जमाए सुबह से ही वहां विराजमान होते हैं जो देर शाम तक स्वयं की हजारों की कमाई तथा अपने से दोगुना संबंधित लेखपालों की कमाई का दम भरते देखे जाते हैं। वहीं अगर कस्बे के संभ्रांत एवं बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों की मानें तो कस्बा देख रहे लेखपाल तथा रागौल देख रहे लेखपाल के पास प्राइवेट व्यक्तियों की भरमार है जो इनके इशारों में बड़े से बड़े काम को चुटकियों में करने के लिए तैयार रहते हैं और यदि कोई गरीब लोग किसी छोटे से छोटे काम के लिए सीधे लेखपाल से मिल भी लें तो विभागीय नियमों का पाठ पढ़ाते हुए कई कई दिनों तक दौड़ाए जाते हैं जिसके फलस्वरूप वो लोग भी दलालों के माध्यम से काम कराने को मजबूर होते हैं।
आपको बता दें कि प्रदेश की सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए जीरो टॉलरेंस की नीति तो अपनाए हुए है लेकिन भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति की धज्जियां उड़ाने में भी तहसील स्तरीय अधिकारी तथा उनके अधीनस्थ कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जो सरकार की मंशा पर पलीता लगाने का काम कर रहे हैं। मौदहा तहसील में तैनात लेखपालों ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के मकसद से कई नए नए तरीके भी अपनाए हैं और तो और बुद्धिजीवियों की मानें तो उक्त लेखपाल पुरानी तहसील परिसर में स्थित भवनों में प्राइवेट कार्यालय भी खोले हुए हैं जहां भ्रष्टाचार तथा दलाली को नए आयाम तक पहुंचाया जाता है तथा खेतों की पैमाइश का खर्च भी यहीं पर तय कर लिया जाता है।
हालांकि उपरोक्त पूरे मामले में तहसीलदार शिखर मिश्रा ने बताया कि अभी तक उनके पास ऐसा कोई मामला नहीं आया है, यदि कोई मामला आता है तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी।