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खाखरा है बहुत ही गुणकारी.. विलुप्त होने की कगार पर

यह बेहद उपयोगी और औषधीय पेड़.. जिसे पलाश, ढाक, टेसू या केसुदो भी कहते हैं..



रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597

मनावर। जिला धार।। खाखरा जिसे पलाश, ढाक, टेसू या केसुदो भी कहते हैं। यह एक बेहद उपयोगी और औषधीय पेड़ है। नारंगी लाल फूलों के कारण जंगल की ज्वाला के नाम से भी जाना जाता है। यह एक मध्यम आकार का, शुष्क पर्णपाती पेड़ है, जिसके फूल फरवरी से अप्रैल के बीच खिलते हैं। यह भारत के ग्रामीण इलाकों में मिलता है। यह आयुर्वेद में बहुत लाभकारी है।

*खाखरा पलाश पेड़ की मुख्य विशेषताएँ और उपयोग*

औषधीय महत्व: पलाश के फूल, पत्ते, जड़ और छाल का उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज में किया जाता है, जैसे कि कीड़े (एंथेलमिंटिक), दस्त, और पेट की समस्याएँ।

होली के रंग: पलाश के फूलों का उपयोग प्राकृतिक रूप से होली के केसरिया-लाल रंग बनाने के लिए किया जाता है।

दोना-पत्तल: इसकी पत्तियों का उपयोग पारंपरिक रूप से भोजन परोसने के लिए पत्तल और दोने बनाने में किया जाता है, विशेष रूप से मंदिरों में प्रसाद के लिए।

धार्मिक महत्व: इसे पवित्र वृक्ष माना जाता है, जिसके फूलों का उपयोग भगवान शिव के श्रंगार और महाकाल के अभिषेक के लिए किया जाता है।

लाख का उत्पादन: इस पेड़ पर लाख के कीड़े पनपते हैं, जिससे लाख प्राप्त होती है।

चारा और ईंधन: पलाश की पत्तियों का उपयोग पशुओं के चारे और लकड़ियों का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है।

पलाश के फूल: जो कि तोते की चोंच जैसे दिखते हैं, वसंत ऋतु में बिना पत्तों के पेड़ों पर एक अद्भुत सौंदर्य बिखेरते हैं।

खाकरे (पलाश) का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म मानने वाले ग्रामीणों का जीवन सदियों से प्रकृति की गोद में पला-बढ़ा है। जंगल, पहाड़, नदियाँ और वृक्ष केवल संसाधन नहीं, बल्कि ग्रामीणों के पूर्वजों की विरासत और आस्था के प्रतीक हैं। इन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में खाकरे (पलाश) का वृक्ष विशेष स्थान रखता है। यह केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि ग्रामीणों की संस्कृति, परंपरा और धार्मिक विश्वासों का जीवंत प्रतीक है।

पारंपरिक उपयोग : खाकरे की जड़ों से मजबूत और टिकाऊ रस्सियाँ बनाई जाती हैं। इन रस्सियों का उपयोग फसलों की गठरियाँ बाँधने, पशुओं को बांधने तथा घरों की छत तैयार करने में किया जाता है। यह ग्रामीणों के पूर्वजों की स्वावलंबी जीवनशैली और प्रकृति के साथ सामंजस्य का उदाहरण है।

सामुदायिक आयोजन में महत्व: खाकरे के पत्तों से दोने-पत्तल बनाए जाते हैं, जिनका उपयोग शादी-ब्याह, पर्व-त्योहार और सामूहिक भोज में होता है। यह परंपरा न केवल सनातन संस्कृति को जीवित रखती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देती है क्योंकि ये पत्तल पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक होते हैं।

धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व : सनातन धर्म में पूजा-अर्चना और त्योहारों के अवसर पर खाकरे के पत्तों का उपयोग ‘नेवज’ (प्रसाद) रखने के लिए किया जाता है। यह वृक्ष सनातन धर्म में ईश्वर के प्रति समर्पण और आस्था का प्रतीक है। कई स्थानों पर पलाश को पवित्र मानकर उसकी पूजा भी की जाती है।

पारंपरिक भोजन में उपयोग : खाकरे के पत्तों पर “पानिये” नामक पारंपरिक व्यंजन बनाया जाता है, जिसे दाल के साथ खाया जाता है। इससे भोजन का स्वाद भी बढ़ता है और प्रकृति के साथ जुड़ाव भी बना रहता है।

सनातन धर्म में खाकरे (पलाश) का पेड़ केवल एक साधारण वृक्ष नहीं, बल्कि सनातन धर्म की पहचान, संस्कृति और धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है। यह सिखाता है कि प्रकृति का सम्मान और संरक्षण ही हमारी असली शक्ति है।

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खाखरा कभी ग्रामीणों की जीविका का संसाधन हुआ करता था मगर आधुनिकता की अंधी दौड़, अंधाधुंध पेड़ो की कटाई और विलुप्त होते जंगलों के कारण खाखरा विलुप्त हो रहा है। आवश्यकता है जिसे बचाने और खाखरे से बनने वाले पत्तल, दोने, रस्सी व्यवसाय को प्रोत्साहित करने की।

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