


गिर्राज जी,श्री गोपीनाथ जी,विमल बिहारी,श्री गोविंदेवजी वृंदा रानी मंदिर में हुआ गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट भव्य दर्शन ,दर्शनों में उमड़े श्रद्धालु
रिपोर्टर मनमोहन गुप्ता कामां डीग 9783029649
कामाँ – आदि वृंदावन कामवन के पुष्टिमार्गीय पंचम निधि श्रीगोकुल चंद्रमा की हवेली व सप्तम निधि श्री मदनमोहन जी मंदिर में गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट महोत्सव में श्रद्धालु उमड पड़े । शुद्धाद्वैत पंचम पीठाधीश्वर जगतगुरु गोस्वामी श्री वल्लभाचार्य जी महाराज जी की सानिध्य में आयोजित गोवर्धन पूजा में सुबह गायों के समक्ष प्रभु ने विराजकर आनंद प्रदान किया । वहीं गोस्वामी बालकों ने दूध दही घृत शर्करा और शहद के साथ गोवर्धन को अभिषेक कराया और उसके बाद विभिन्न ग्वाल वालों को वस्त्र आदि भेंट करके उनकी पहरावनी की । उसके बाद दोपहर 3:00 बजे अन्नकूट दर्शनों में श्रद्धालुओं का ताँता उमड पड़ा । जिसमें अनेक प्रकार की व्यंजन सामग्री ठाकुर जी के समक्ष प्रसाद के लिए रखे गए जिनमें लड्डू मोनथार ठौर पेड़ा बासोंधी लुचई जीरा चावल मूंग पापड़ बुझेना आदि विभिन्न प्रकार के व्यंजन ठाकुर जी के समक्ष समर्पित गए दही भात शिखरन भात मेवा भात आदि व्यंजनों को प्रभु के समक्ष समर्पित किया गया।वहीं सप्तम पीठ श्री मदनमोहनजी मंदिर में सप्तम पीठाधीश्वर गोस्वामी ब्रजेश कुमार जी महाराज के सान्निध्य में गोवर्धन पूजा व अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया गया ।
वही दूसरी ओर तीर्थराज विमलकुण्ड विराजित गिर्राज जी, विमल बिहारी मन्दिर पर भव्य अन्नकूट का आयोजन हुआ तथा प्रसाद पारंपरिक तरीके से तैयार कर भगवान को अर्पित किया गया।
अन्नकूट पूजा हिंदू धर्म का एक खास और पवित्र त्योहार है। यह दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण को तरह-तरह के पकवानों का भोग चढ़ाया जाता है, जो अन्नकूट यानी भोजन के पहाड़ का प्रतीक है। ऐसे कुल 56 पकवानों का भोग भगवान श्रीकृष्ण को लगाया जाता है। यह त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है।
यह त्योहार अहंकार पर भक्ति की जीत का प्रतीक है ।श्रीकृष्ण ने इन्द्र का मान मर्दन किया।
खासकर ब्रज क्षेत्र में यह उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, जहां मंदिरों में सैकड़ों तरह के पकवान चढ़ाए जाते हैं।
अन्नकूट पूजा की कहानी श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण से जुड़ी है। द्वापर युग में वृंदावन के लोग हर साल इंद्र देव की पूजा करते थे ताकि बारिश अच्छी हो और फसलें लहलहाएं। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि इंद्र की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वही गायों को चारा, पानी और छांव देता है। ब्रजवासियों ने कृष्ण की बात मानी और गोवर्धन की पूजा शुरू की। इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने सात दिन तक भयंकर बारिश कर दी। कृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों और गायों को बचा लिया।
सातवें दिन इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने बारिश रोककर कृष्ण से माफी मांगी। इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण 7 दिनों तक भूखे रहे। इस पर ब्रजवासियों ने माता यशोदा से पूछा कि वे श्रीकृष्ण को कब-कब और क्या खिलाती थी। उन्होंने बताया कि वे कृष्ण को हर दिन में 8 बार अलग-अलग पकवान खिलाती थीं। इस पर ब्रजवासियों ने 7 दिन के हिसाब से 8-8 पकवान मतलब कुल 56 प्रकार के पकवानों का भोग भगवान श्रीकृष्ण को लगाया। उस दिन से गोवर्धन पूजा के साथ ही भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाया जाता है।
अन्नकूट पूजा के लिए गाय क़े गोबर से गोवर्धन पर्वत का एक प्रतीक बनाकर उन्हें फूल, पत्तियों और छोटे पत्थरों से सजाया जाता है । इसके बाद तरह-तरह के 56 प्रकार के पकवान जैसे चावल, दाल, सब्जियां, खीर, गुलाब जामुन, फल और नमकीन आदि तैयार करे। इन्हें पहाड़ की शक्ल में सजाकर भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन महाराज को चढ़ाकर ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप कर श्रीकृष्ण की आरती की जाती है तथा सात परिक्रमा की जाती हैं ॥
इस अवसर पर ब्रज चौरासी कोस के प्रमुख केंद्र कामवन के विभिन्न मंदिरों में श्रद्धालुओं ने अन्नकूट महोत्सव के दर्शन कर अन्नकूट प्रसादी ग्रहण की । इन मंदिरों में राधावल्लभ मंदिर, गोविंददेव वृन्दरानी मंदिर, गिरिराज जी मंदिर, मुरली मनोहर कावड़िया मंदिर, गोपीनाथ मंदिर आदि में लोगों ने दर्शन किए ।