

डॉ. योगिता सिंह राठौड़ “प्राचार्य” माँ नर्मदा कॉलेज ऑफ एजुकेशन धामनोद
रिपोर्टर : दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597 अखंड भारत न्यूज चैनल लाइव
मनावर। जिला धार।। डिजिटल युग ने मानव जीवन को जितना सहज, तेज़ और सुविधाजनक बनाया है, उतना ही जटिल और संवेदनशील भी। तकनीक का यह युग जहाँ ज्ञान, संवाद और मनोरंजन के नए द्वार खोलता है, वहीं इसके दुष्परिणाम भी धीरे-धीरे समाज के भीतर गहराई तक पैठ बना रहे हैं। हाल ही में सामने आया गाजियाबाद हादसा इसी कटु सत्य का भयावह उदाहरण है, जिसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम अपने बच्चों को एक अदृश्य, लेकिन खतरनाक दुनिया के हवाले कर चुके हैं?
यह घटना केवल एक आपराधिक समाचार नहीं है, बल्कि समाज, परिवार, शिक्षा व्यवस्था और डिजिटल संस्कृति-सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह हादसा बच्चों के मानसिक विकास पर सोशल मीडिया और वीडियो गेम के अनियंत्रित प्रभाव का ऐसा आईना है, जिसमें झाँकने से हम अक्सर बचते रहे हैं।
डिजिटल बचपन : सुविधा या संकट ?
आज का बच्चा बहुत कम उम्र में मोबाइल फोन, टैबलेट और इंटरनेट से परिचित हो जाता है। जहाँ पहले खेल का मैदान, किताबें और पारिवारिक संवाद बचपन का आधार थे, वहीं अब उनकी जगह स्क्रीन, रील्स, ऑनलाइन गेम और वर्चुअल पहचान ने ले ली है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहे, बल्कि वे उनकी सोच, भाषा, व्यवहार और भावनाओं को भी प्रभावित कर रहे हैं। वीडियो गेम, विशेषकर हिंसक और आक्रामक प्रवृत्ति वाले गेम, बच्चों के मानस पर गहरा असर डालते हैं। बार-बार हत्या, बदले, जीत-हार और वर्चुअल हिंसा को खेल के रूप में देखने वाला बच्चा धीरे-धीरे संवेदनशीलता खोने लगता है। वास्तविक और आभासी दुनिया के बीच का अंतर धुंधला पड़ने लगता है, और यही स्थिति भविष्य में खतरनाक रूप ले सकती है।
गाजियाबाद हादसा: एक घटना नहीं, एक संकेत
गाजियाबाद हादसा को केवल व्यक्तिगत अपराध या पारिवारिक विफलता मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह घटना बताती है कि बच्चों की मानसिक दुनिया में क्या चल रहा है, वे किन प्रभावों से घिरे हैं और हम अभिभावक, शिक्षक और समाज – कितने अनजान बने हुए हैं। यह हादसा इस ओर इशारा करता है कि जब बच्चे निरंतर आभासी हिंसा, असंवेदनशील कंटेंट और आक्रामक मनोरंजन से घिरे रहते हैं, तो उनके भीतर नैतिक विवेक, सहानुभूति और आत्म-संयम कमजोर होने लगता है। परिणामस्वरूप, वे किसी भी स्थिति में सही-गलत का अंतर समझने में असफल हो सकते हैं।
सोशल मीडिया : दिखावे और दबाव की दुनिया
सोशल मीडिया बच्चों के लिए एक ऐसी दुनिया बन गई है, जहाँ लोकप्रियता, लाइक्स और फॉलोअर्स आत्म-मूल्य का पैमाना बनते जा रहे हैं। यह तुलना, प्रतिस्पर्धा और दिखावे की संस्कृति बच्चों के मन में असंतोष, कुंठा और आक्रोश पैदा करती है। कई बार बच्चे स्वयं को कमतर महसूस करने लगते हैं, और यह मानसिक तनाव उन्हें गलत रास्तों की ओर धकेल सकता है। इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया पर उपलब्ध अनियंत्रित कंटेंट – हिंसा, अश्लीलता, नकारात्मक चुनौतियाँ और अपराध का महिमामंडन – बच्चों के व्यवहार को विकृत कर सकता है। गाजियाबादहादसा जैसी घटनाएँ इसी मानसिक प्रदूषण की परिणति कही जा सकती हैं।
अभिभावकों की भूमिका : सुविधा या जिम्मेदारी ? आज के व्यस्त जीवन में कई अभिभावक बच्चों को मोबाइल फोन देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेते हैं। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। तकनीक को सुविधा के रूप में अपनाना गलत नहीं, लेकिन उसे बच्चे का स्थायी साथी बना देना गंभीर भूल है। अभिभावकों को यह समझना होगा कि बच्चों के डिजिटल जीवन की निगरानी उतनी ही आवश्यक है, जितनी उनके शारीरिक स्वास्थ्य की । बच्चों से संवाद, उनके भावनात्मक उतार-चढ़ाव को समझना और उन्हें वास्तविक दुनिया से जोड़ना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। शिक्षा व्यवस्था और समाज की जिम्मेदारी विद्यालय केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकते। डिजिटल साक्षरता, नैतिक शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर संवाद अब शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। बच्चों को यह सिखाना होगा कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, न कि तकनीक के अधीन कैसे जिया जाए। समाज और नीति-निर्माताओं को भी बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण सुनिश्चित करना होगा। उम्र-अनुकूल कंटेंट, गेम्स पर नियंत्रण और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करना समय की मांग है।
समाधान की दिशा : गाजियाबाद हादसा जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए हमें सामूहिक रूप से कदम उठाने होंगे- बच्चों के स्क्रीन समय पर संतुलित नियंत्रण पारिवारिक संवाद और भावनात्मक जुड़ाव खेल, कला और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा विद्यालयों में काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम सोशल मीडिया और गेमिंग कंटेंट पर सख़्त निगरानी गाजियाबाद हादसा हमें यह याद दिलाता है कि तकनीक स्वयं में न तो अच्छी है, न बुरी। उसका उपयोग ही उसका चरित्र तय करता है। यदि हम समय रहते नहीं चेते, तो डिजिटल दुनिया का यह अंधेरा हमारे बच्चों के भविष्य को निगल सकता है।
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की – कि क्या हम अपने बच्चों को केवल आधुनिक बना रहे हैं या संवेदनशील, नैतिक और जिम्मेदार नागरिक भी? यह प्रश्न केवल गाजियाबाद हादसा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज के भविष्य से जुड़ा हुआ है। बचपन को बचाने की जिम्मेदारी आज हमारी है, क्योंकि कल बहुत देर हो सकती है।
डॉ. योगिता सिंह राठौड़ प्राचार्य
माँ नर्मदा कॉलेज ऑफ एजुकेशन धामनोद