पांडवकालीन बावड़ी के संरक्षण के लिए आगे आने लगे दानदाता….
रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। जिला धार।। ग्राम देदला स्थित प्राचीन बावड़ी और मंदिर परिसर की साफ-सफाई एवं सौंदर्यीकरण की पहल अब जनसहयोग का रूप लेने लगी है। स्थानीय मान्यताओं में पांडवकालीन मानी जाने वाली इस बावड़ी की दुर्दशा को देखते हुए कुछ युवाओं ने श्रमदान कर सफाई की शुरुआत की थी। अब दानदाता भी इस धार्मिक स्थल की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए आगे आ रहे हैं। इसी क्रम में स्वर्गीय श्री नरेशचंद्रजी मालवीया की स्मृति में सात कुर्सियां सप्रेम भेंट की गईं।
इनमें से तीन कुर्सियां नर्मदा परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं के विश्राम के लिए तथा चार कुर्सियां प्राचीन बावड़ी के समीप स्थित हनुमानजी, अंबे माताजी और बाबा भोलेनाथ के मंदिरों में श्रद्धालुओं के बैठने के लिए दी गई हैं। दानदाता की इस पहल से श्रद्धालुओं को सुविधा मिलने के साथ ही धार्मिक स्थल पर जनसहयोग से व्यवस्थाएं विकसित करने के प्रयासों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
*श्रमदान से बदली बावड़ी की तस्वीर, वर्षों की गाद और पूजन सामग्री निकाली*
प्राचीन बावड़ी और मंदिर परिसर की दुर्दशा को देखते हुए गत दिनों ग्राम गुलाटी के परवेश भूरिया, आकाश मेहड़ा, कन्हैया डोडवे, दामू निकम तथा देदला के नारायण पाटीदार ने आगे आकर श्रमदान किया। उन्होंने मंदिरों और परिसर में साफ-सफाई की। वहीं, बावड़ी में वर्षों से जमा गाद और ग्रामीणों द्वारा हवन-पूजन के बाद डाली गई पूजन सामग्री को बाहर निकालकर सफाई की गई। इससे बावड़ी और आसपास के परिसर को स्वच्छ एवं व्यवस्थित बनाने की दिशा में पहल हुई है।
बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित इस बावड़ी की बनावट और आसपास मौजूद पुराने निर्माण के अवशेष इसके ऐतिहासिक महत्व की ओर संकेत करते हैं। ऐसे में इसकी मूल संरचना को सुरक्षित रखते हुए वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और सौंदर्यीकरण किया जाना जरूरी है। जनसहयोग से शुरू हुए प्रयासों के बाद अब उम्मीद जगी है कि अन्य दानदाता भी आगे आकर इस धरोहर को सहेजने में अपना योगदान देंगे।
*खेड़ा गांव के नाम से पहचाना जाता था देदला का पुराना क्षेत्र*
ग्रामीणों के अनुसार, मां कालिका मंदिर और प्राचीन बावड़ी के बीच स्थित क्षेत्र को पहले खेड़ा गांव के नाम से जाना जाता था। बाद में पक्की सड़क बनने के दौरान गांव की बसावट दूसरी जगह स्थानांतरित हो गई। मंदिर और बावड़ी के बीच आज भी पुरानी बसावट के कुछ अवशेष दिखाई देते हैं। इनका व्यवस्थित अध्ययन किया जाए तो क्षेत्र के पुराने रहन-सहन, आवासीय व्यवस्था और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है।
*धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक महत्व भी समेटे है स्थल*
मनावर से करीब छह किलोमीटर दूर बड़वानी मार्ग पर ग्राम देदला से लगभग डेढ़ किलोमीटर अंदर पहाड़ियों और हरियाली के बीच स्थित यह प्राचीन धाम धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां मां काली, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती पिंडी स्वरूप में विराजित हैं। मंदिर परिसर के आसपास प्राचीन बावड़ी, गुफाएं, प्राकृतिक कुंड और पुरानी बसावट के अवशेष इस स्थल को विशिष्ट बनाते हैं।
स्थानीय मान्यताओं से जुड़े इस क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए साफ-सफाई के साथ सुनियोजित संरक्षण की आवश्यकता है। दानदाताओं द्वारा कुर्सियां भेंट करने और युवाओं के श्रमदान से शुरू हुई पहल इस दिशा में सकारात्मक कदम है। यदि जनसहयोग के साथ संबंधित विभाग भी ध्यान दें तो प्राचीन बावड़ी और आसपास की धरोहरों को सुरक्षित रखते हुए श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।
