

अज्ञान-अंधकार को मिटाकर आत्म-ज्ञान की ओर ले जाता स्वाध्याय:-आचार्य विनीत सागर
रिपोर्टर मनमोहन गुप्ता कामां डीग 9783029649
कामां – डीग जिले के कस्बा कामां कामवन के विजयमती त्यागी आश्रम में विराजमान दिगंबर जैनाचार्य विनीत सागर महाराज ने स्वाध्याय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए जैन श्रावकों से नियमित प्रवचनों में कहा कि जैन धर्म में स्वाध्याय का अत्यधिक महत्त्व है।क्योंकि यह अज्ञान-अंधकार को मिटाकर आत्म-ज्ञान की ओर ले जाता है, सम्यक् ज्ञान प्रदान करता है, बुद्धि को निर्मल करता है, मन में अच्छे संस्कार भरता है, और अंततः कर्मों का क्षय कर मोक्ष मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे जीवन में सही दिशा आती है और वासनाएँ क्षीण होती हैं. यह जैन साधना के बारह आंतरिक तपों में से एक है जो आत्म-साधना के लिए अनिवार्य है। स्वाध्याय परम तप है।
उन्होंने कहा कि तीर्थंकर के जन्म और तप कल्याणक का बड़ा ही महत्व है ये आत्म-कल्याण और जगत-कल्याण के प्रतीक हैं; जन्म कल्याणक (गर्भ में आने से लेकर जन्म तक) एक शुद्ध और पवित्र आत्मा के अवतरण को दर्शाता है, जिससे पूरे जगत में शांति और सुख फैलती है, वहीं तप कल्याणक (दीक्षा और घोर तपस्या) आत्मिक शुद्धि और निर्वाण के मार्ग का आरंभ है, जो सांसारिक मोह-माया त्यागकर आत्म-ध्यान और कर्म-क्षय की प्रक्रिया को दर्शाता है, जिससे अन्य जीव भी प्रेरणा लेकर आत्म-कल्याण का मार्ग अपनाते हैं।आचार्य ने समझाते हुए कहा कि प्रत्येक जीव को अपने अमूल्य समय में से कुछ समय स्वाध्याय हेतु आवश्यक निकालना चाहिए यही कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है आचार्य के संघ में मुनि श्री अर्पण सागर महाराज भी है जो शीतकालीन वाचना हेतु विजय मती त्यागी आश्रम में विराजमान रहेंगे।