
भारतीय जनसंघ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा भाजपा के संस्थापक प्रदेशाध्यक्ष, महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री लोकनेते स्व. नानासाहेब उत्तमरावजी पाटील की 18 नवंबर पुण्यस्मृति-दिवस पर, वरिष्ठ भाजपा कार्यकर्ता तथा पत्रकार श्री अनिलकुमार द्वा. पालीवाल द्वारा लिखित स्मृति-लेख… खास पाठकों के लिए…
स्वातंत्र्योत्तर महाराष्ट्र की राजनीति में निष्ठा, आदर्श और संघर्ष का एक सशक्त पर्व के निर्माता,मार्गदर्शक तथा प्रेरणास्त्रोत के रूप में जिन्हें विशेष सम्मान प्राप्त था, ऐसे स्वर्गीय नानासाहेब उत्तमराव लक्ष्मणराव पाटील की आज पुण्य-स्मृति है। नानासाहेब का जन्म चाळीसगांव तालुका के वाघळी में सूर्यवंशी परिवार में हुआ। खेती और मिट्टी से गहरा जुड़ाव रखने वाला यह परिवार संपूर्ण खानदेश में प्रसिद्ध था। उच्च शिक्षा लेकर उन्होंने धुले में वकालत शुरू की और शीघ्र ही अपनी पहचान बनाई।
राष्ट्रीय विचारों से प्रेरित होकर, तथा कांग्रेस की नीतियों का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए जब वरिष्ठ जनसंघ नेताओं ने इस किसान-पुत्र में नेतृत्व की क्षमता देखी, तब नानासाहेब जनसंघ में शामिल हुए। उस समय राज्य में दो “नानासाहेब” प्रसिद्ध थे—कांग्रेस के यशवंतराव चव्हाण और क्रांतिवीर नाना पाटील। जनसंघ में जगन्नाथराव जोशी और बिंदुमाधव जोशी प्रमुख थे, और इनके साथ तीसरे अग्रणी चेहरे के रूप में नानासाहेब उत्तमराव पाटील उभरे।
राज्यस्तर पर उनकी लोकप्रियता मुख्यतः किसानों की समस्याओं पर प्रकाशित उनकी श्वेतपत्रिका से बढ़ी। खानदेश के कपास उत्पादक किसानों की आर्थिक दुर्दशा को उन्होंने सरकार के सामने प्रखरता से रखा, जिससे पूरे राज्य में किसान आंदोलनों को नई दिशा मिली। उस समय जनसंघ को “ब्राह्मणवादी” पार्टी कहकर बदनाम किया जाता था, ऐसे में मराठा नेतृत्व के रूप में नानासाहेब को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।इसी दौर में संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन जोरों पर था। गुजरात–मुंबई सीमा विवाद, और लोकसभा चुनावों की घोषणा के बीच महाराष्ट्र के सभी विरोधी दलों ने “संयुक्त महाराष्ट्र समिति” बनाकर चुनाव में उतरने का निर्णय किया। धुले लोकसभा क्षेत्र से समिति के उम्मीदवार के रूप में नानासाहेब ने जनसंघ के ‘दीया’ चिन्ह पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की। उस चुनाव में देशभर से जनसंघ के केवल दो सांसद जीते—धुले से नानासाहेब और बलरामपुर (उ.प्र.) से स्व. अटलबिहारी वाजपेयी।लोकसभा में नानासाहेब ने राष्ट्रीय, राज्य और क्षेत्र के अनेक प्रश्नों को प्रभावी ढंग से उठाया और समाधान भी करवाए। जनसंघ के विधान परिषद सदस्य और विरोधी पक्ष नेता के रूप में उनकी प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ी। लगभग 27 वर्षों तक विधायक और विरोधी पक्ष नेता रहते उन्होंने अनेक संसदीय और विधानमंडल समितियोंमें अमिट छाप छोड़ी। उनकी संसदीय यात्रा और अनुभव पर स्व. दि. घ. दातार की लिखित आत्मपरिचयात्मक पुस्तक “सूर्यफूल” अत्यंत प्रसिद्ध है।
उनकी अनगिनत यादों में से कुछ प्रमुख प्रसंग इस प्रकार हैं—
कांग्रेस नेताओं ने उन्हें कई बार उपमुख्यमंत्री पद की पेशकश की, परंतु उन्होंने जनसंघ नहीं छोड़ा। 1975 की आपातकाल के दौरान संचार का मुख्य साधन पत्र था,उन्होंने लगभग दस हजार पत्र लिखे और कार्यकर्ताओंसे निरंतर संपर्क बनाए रखा। उनके लोकसंग्रह की ताकत यही थी कि जिस गाँव में वे जाते, वहाँ पहले से सूचना पहुँच चुकी होती। वे कहा करते—“लोक आपके पास तभी आते हैं जब आप उनके लिए काम करते हैं।”भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के लिए बांद्रा रिक्लेमेशन के प्रथम अधिवेशन में उनके साथ कार्य करते समय लेखक ने उनका जनसंपर्क कौशल प्रत्यक्ष अनुभव किया। चोपड़ा से जळगांव होते हुए पचास कार्यकर्ताओं का जत्था दादर पहुँचा। मुंबई भाजपा की युवा टीम—किरीट सोमय्या, रमेश मर्ढेकर, विनोद तावडे, मेघाताई कुलकर्णी—आदि आयोजन में सक्रिय थे। स्व. राम नाईक, हसु अडवाणी, वामनराव परब आदि नेता नानासाहेब के मार्गदर्शन में कार्यरत थे। उद्घाटन सत्र में स्व. व्यंकप्पा नायडू, सिकंदर बख्त, मदनलाल खुराना, बॅरिस्टर जेठमलानी, बॅरिस्टर एम.सी. छागला आदि ने नए भारत के निर्माण का आवाहन किया। इसी अधिवेशन में नानासाहेब को प्रदेशाध्यक्ष घोषित किया गया। इसके पूर्व आपात्कालके समय प्रकृति-अस्वस्थता के कारण उन्हें औपचारिक गिरफ्तारी से छूट मिली, पर वे घर में स्थिर नहीं बैठे। जनसंघ के सभी शीर्षस्था नेता गण कारावास के कारण जेल मे थे…तब भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार नानासाहेब उत्तमरावजी पाटील ने भलीभांती संभाला था l उसवक्त चोपड़ा में संघ-जनसंघ परिवार के कार्यकर्ताओं की विशेषतः स्व. मधुकाका माळी इनके निवास पर नियमित गुप्त बैठक होतीं। शाखा संभव नहीं थी, पर संपर्क निरंतर चलता रहा। बाद में धुले लोकसभा सीट के विभाजन से एरंडोल लोकसभा क्षेत्र बना। नानासाहेब धुले में पराजित हुए, परंतु एरंडोल से सोनुसिंग अण्णा विजयी हुए और उन्हें केंद्र में गृह राज्यमंत्री पद प्राप्त हुआ। कुछ समय बाद नानासाहेब पारोळा से विधानसभा जीते और राज्य के ‘पुलोद’ मंत्रिमंडल में महसूल मंत्री बने। इसी दौरान उनके ज्येष्ठ पुत्र का मुंबई में दुर्घटनाग्रस्त निधन हुआ—जिसने उन्हें भीतर से तोड़ दिया, पर वे पुनः खड़े हुए।उनके दूसरे पुत्र प्रदीप पाटील राजनीति में आए, पर सफलता नहीं मिली। इसके बाद एरंडोल से नानासाहेब ने मात्र साढ़े चार हजार मतों से विजय प्राप्त कर धुले की पराजय का बदला लिया और दूसरी बार लोकसभा पहुँचे। उन्नीस महीने की अटलजी सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री पद की पेशकश हुई, पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक नकार दिया। बाद मे राज्यपाल पद भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया—क्योंकि उनका मन सदैव जनता के बीच सेवा-कार्य में ही रमणीय था।
वे सदा कहते—“सत्ता आती-जाती रहती है, पर सेवा-कार्य अमर रहता है।”
आज उनकी 24वीं पुण्यस्मृति पर अनगिनत यादे मन में उमड़ती हैं, पर मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए लेख यहीं समाप्त करता हूँ। स्व. नानासाहेब को कोटि-कोटि श्रद्धांजलि।
ॐ शांति।
लेखक – अनिलकुमार द्वा. पालीवाल, वरिष्ठ पत्रकार, जळगांव