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शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व का निर्माण हो

आज आवश्यकता है विद्यालय महाविद्यालय न केवल ज्ञान का केंद्र बनें, बल्कि चरित्र निर्माण के केंद्र बनें ...प्राचार्य डॉ.योगिता सिंह राठौड़

विश्व शिक्षक दिवस पर विशेष लेख….

डॉ.योगिता सिंह राठौड़ प्राचार्य
माँ नर्मदा कॉलेज ऑफ एजुकेशन धामनोद

आज जब शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम समझा जाने लगा है, तब इस प्रश्न पर पुनर्विचार आवश्यक है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या शिक्षा केवल अंकों, प्रमाण पत्रों और डिग्रियों तक सीमित रह जानी चाहिए, या वह जीवन को दिशा देने वाली, व्यक्तित्व को गढ़ने वाली शक्ति बननी चाहिए? वस्तुतः शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्ति का निर्माण नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माण है अर्थात् ऐसे नागरिक का विकास जो ज्ञान, संस्कार, संवेदना और उत्तरदायित्व से संपन्न हो।

भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था में “विद्या” का अर्थ केवल ज्ञानार्जन नहीं था, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाना था। गुरुकुलों में छात्रों को शास्त्र, शस्त्र, नीति, निष्ठा, अनुशासन और सेवा की भावना सिखाई जाती थी। वहाँ शिक्षा का केंद्र मनुष्य का सर्वांगीण विकास था शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक सभी स्मरों पर। आज जब शिक्षा प्रणाली मुख्यतः परीक्षा- केंद्रित हो गई है। तब इस दृष्टिकोण की पुनर्स्थापना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप इतना व्यावसायिक हो गया है कि उसका मानवीय पक्ष पीछे छूटता जा रहा है। विद्यार्थी में ज्ञान तो है, पर संवेदना नहीं; बुद्धि तो है, पर विवेक का अभाव है, योग्यता तो है, पर नैतिकता नहीं। यही कारण है कि समाज में शिक्षित व्यक्तियों की संख्या बढ़ने के बावजूद मूल्य और संस्कारों का ह्रास हो रहा है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से बताती है कि हम व्यक्ति तो बना रहे हैं, पर व्यक्तित्व नहीं गढ़ पा रहे।

व्यक्तित्व का निर्माण केवल पुस्तकीय ज्ञान से नहीं होता। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा मनुष्य के भीतर आत्मबल, आत्मविश्वास और नैतिक साहस का विकास करे। एक सच्चा शिक्षित व्यक्ति वही है जो अपने ज्ञान का उपयोग केवल अपने हित के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए करे।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था – “शिक्षा का उद्देश्य केवल बुद्धि का विकास नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण है।” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना दशकों पहले था।

नई शिक्षा नीति (2020) ने इस दिशा में एक सकारात्मक पहल की है, जिसमें केवल अकादमिक उपलब्धियों पर नहीं, बल्कि समग्र विकास पर बल दिया गया है। आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता, सहयोग, और नैतिक शिक्षा जैसे तत्व अब शिक्षा के केंद्र में रखे जा रहे हैं। इसका उद्देश्य यही है कि विद्यार्थी जीवन के हर क्षेत्र में संतुलित, संवेदनशील और सशक्त नागरिक बन सके। शिक्षक इस प्रक्रिया के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। वे केवल विषय नहीं पढ़ाते, बल्कि जीवन के मूल्य सिखाते हैं। एक प्रेरक शिक्षक अपने विद्यार्थियों में न केवल ज्ञान का दीप जलाता है, बल्कि उनमें आत्मविश्वास, करुणा और जिम्मेदारी की भावना भी उत्पन्न करता है। ऐसे शिक्षक ही व्यक्तित्व निर्माण के वास्तविक शिल्पी कहलाते हैं।

आज आवश्यकता है कि विद्यालय और महाविद्यालय केवल ज्ञान- केंद्र न बनें, बल्कि चरित्र निर्माण के केंद्र बनें।

पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा, पर्यावरण चेतना, सेवा भाव, और जीवन कौशल जैसे विषयों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। परिवार और समाज को भी यह समझना होगा कि बच्चे की सफलता केवल उसके अंकों से नहीं, बल्कि उसके आचरण और संवेदनशीलता से आँकी जानी चाहिए। शिक्षा वही है जो मनुष्य को सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता दे। जो उसे आत्ममंथन करना सिखाए, दूसरों के दृष्टिकोण को समझने की दृष्टि दे, और कठिन परिस्थितियों में भी सच्चाई के मार्ग पर चलने का साहस प्रदान करे। जब शिक्षा मनुष्य के भीतर यह चेतना जगाती है, तभी वह व्यक्तित्व निर्माण का साधन बनती है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना या आर्थिक सफलता अर्जित करना नहीं है, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना है जो संवेदनशील, विचारशील और नैतिक रूप से सशक्त हों। ज्ञान तभी सार्थक है जब वह मनुष्य को बेहतर इंसान बनाए । इसीलिए कहा गया है ” शिक्षा का लक्ष्य केवल बुद्धि का विकास नहीं, बल्कि चरित्र की निर्मिति है।”

आज की पीढ़ी को यही समझना होगा कि व्यक्ति बनना आसान है, पर व्यक्तित्व बनाना साधना है – और यही साधना सच्ची शिक्षा का सार है।

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत एडवोकेट / प्रेस रिपोर्टर मनावर जिला धार मध्यप्रदेश MobNo 9179977597

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