
“आधुनिक जीवन में दशहरे का संदेश : भीतर के रावण का हो दहन”

_डॉ. योगिता सिंह राठौड़
प्राचार्य नर्मदा कॉलेज ऑफ एजुकेशन धामनोद
भारत का सांस्कृतिक परिदृश्य विविध पर्वों और त्यौहारों से समृद्ध है। इनमें से दशहरा अथवा विजयादशमी विशेष महत्व रखता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि मानवीय मूल्यों, सामाजिक आदर्शों और नैतिक आचरण का भी द्योतक है। रामायण में रावण का वध असत्य और अन्याय पर सत्य और धर्म की विजय का प्रतीक माना गया है। किंतु यदि हम गहराई से देखें तो रावण केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि हमारे भीतर विद्यमान नकारात्मक प्रवृत्तियों का भी प्रतीक है। कही यही कारण है कि दशहरे का संदेश आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है।
वास्तविकता यह है कि आधुनिक समाज में रावण के स्वरूप बदल गए हैं। आज रावण भ्रष्टाचार के रूप में हमारे सामने खड़ा है, जो सार्वजनिक जीवन और प्रशासन दोनों को खोखला करता जा रहा है। कहीं यह रावण लोभ और भौतिकतावाद का रूप धारण कर समाज में असमानता और असंतोष फैलाता है, तो कहीं यह अहंकार और स्वार्थ बनकर मानवीय संबंधों को कमजोर करता है। इसके अतिरिक्त, डिजिटल युग में यह रावण नई चुनौतियां भी प्रस्तुत कर रहा है – जैसे आभासी दुनिया की लत, असंवेदनशीलता और सामाजिक विघटन। इन परिस्थितियों में दशहरे का पर्व हमें आत्मावलोकन और आत्मसंयम का मार्ग दिखाता है।
दशहरे की परंपरा केवल रावण के पुतले के दहन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि हम मैदानों में खड़े रावण को जला तो दें, किंतु अपने भीतर बसे अहंकार, ईर्ष्या, लोभ और असत्य को जीवित रखें, तो इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। इसीलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन में आत्मचिंतन का भाव विकसित करें और उन प्रवृत्तियों का दमन करें जो व्यक्तिगत प्रगति और सामाजिक समरसता में बाधक हैं।
आज समाज को सबसे अधिक जरूरत नैतिक मूल्यों, सत्यनिष्ठा और सहयोग की है। इस दिशा में दशहरा हमें प्रेरित करता है कि- अहंकार का दहन कर विनम्रता को जीवन का आधार बनाया जाए। क्रोध का दहन कर संवाद और धैर्य की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए। लोभ का दहन कर संतोष और संतुलन को अपनाया जाए। असत्य का दहन कर सत्यनिष्ठा और ईमानदारी को प्रतिष्ठित किया जाए। यदि प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प ले कि वह अपने भीतर के रावण को पराजित करेगा, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में सुधार आएगा, बल्कि समाज भी अधिक संतुलित, सहिष्णु और समरस बन सकेगा। समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर के रावण को पराजित करने का संकल्प ले। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अच्छाई का मार्ग कठिन अवश्य हो सकता है, किंतु अंततः विजय उसी की होती है। यही दशहरे का सार है- अच्छाई का मार्ग कठिन अवश्य हो सकता है, किंतु अंततः विजय उसी की होती है।
दशहरा मात्र एक पौराणिक कथा का स्मरण नहीं है। यह हमारे समय के लिए एक जीवंत संदेश है कि 22 चाहे बाहर हो या भीतर, उसका नाश करना ही सच्चे जीवन की पहचान है। जब तक हम भीतर के रावण का दहन नहीं करेंगे, तब तक बाहरी रावण का दहन अधूरा रहेगा। अतः दशहरे का वास्तविक और शाश्वत संदेश यही है कि हम आत्मावलोकन करें, संयम और नैतिकता को अपनाएँ तथा अच्छाई को जीवन में प्रतिष्ठित करें। तभी यह पर्व सार्थक होगा और समाज को नई दिशा देगा। आधुनिक जीवन में दशहरे का संदेश ” यही है कि हम केवल बाहरी बुराइयों से नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे रावण से भी लड़ें। जब हर व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार, लोभ और क्रोध का दहन करेगा, तभी समाज में शांति, सौहार्द और समृद्धि स्थापित होगी। रावण दहन की ज्वाला तब ही सार्थक होगी जब वह हमारी आत्मा के अंधकार को भी उजाले में बदल सके।
दशहरा (विजयादशमी) पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।।
रिपोर्टर : दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर जिला धार मध्यप्रदेश पिन 454446………..