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१३५ वर्षों से पालीवाल परिवार स्थापित कर रहा है लासूर का माननीय गांव गणपति

१३५ वर्षों से पालीवाल परिवार स्थापित कर रहा है लासूर का माननीय गांव गणपति  

 

चोपड़ा (अनिलकुमार पालीवाल)
गणेशोत्सव का नाम आते ही सभी श्री गणेश भक्तों के साथ-साथ व्यापारी, किसान और आम जनमानस में अपार उत्साह देखा जाता है।

लासूर (ता. चोपड़ा) के गणेश भक्त ग्रामवासियों ने कई वर्षों से एक अनोखी परंपरा को जीवित रखा है और वह है गांव गणपति की स्थापना की। पिछले १३५ वर्षों से सातपुड़ा की तलहटी में बसे लासूर गांव का “गांव गणपति” ही “माननीय गणपति” कहलाता है। आज के समय में ऐसी परंपरा कहीं और दिखाई नहीं देती। समय बदल गया, लेकिन आज भी लासूर गांव में यह परंपरा १३५ वर्षों से निरंतर चल रही है। गांव की परंपरा के अनुसार गांव में केवल एक मूर्ति की गांव गणपति के रूप में प्रतिष्ठापना की जाती थी। आज भले ही गांव में छोटे-बड़े कई गणेश मंडल हैं, लेकिन गांव गणपति मंडल के प्रति जो श्रद्धा और उत्साह है, उसकी कोई तुलना नहीं। पूरे गांव के बच्चे, बुजुर्ग, स्त्री-पुरुष इस हेतु हमेशा तत्पर रहते हैं।

पहले “एक गांव एक गणपति” की संकल्पना नहीं थी। परंतु प्रखर स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य टिळक द्वारा शुरू किया गया यह लोकसंग्रह और धार्मिक जागृति का पर्व, लासूर गांव में गांव गणपति के रूप में पहचान बना सका। यही मान-सम्मान आज भी ग्रामवासी सदैव देते आ रहे हैं। इस वर्ष भी श्रीराम मंदिर में गांव गणपति की स्थापना की गई।

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गांव की परंपरा

गणेश मूर्ति बनाने का कार्य यहां के पालीवाल परिवार के पास है। स्व. नाटू लहानू पालीवाल ने सबसे पहले लगभग १३५ वर्ष पूर्व गणेश जी की मूर्ति बनाई थी और ग्रामवासियों ने उसी मूर्ति को “गांव गणपति” के रूप में प्रतिष्ठित किया। आज भी पालीवाल परिवार की पाँचवी पीढ़ी गणेश मूर्तियां बना रही है। इस पाँचवीं पीढ़ी में भी मूर्ति बनाने की कला पहले जैसी ही जीवित है। मूर्ति की ऊँचाई केवल दो फुट की रहती है।

विशेष बात यह है कि हर वर्ष नई मूर्ति बनाई जाती है और यह जिम्मेदारी पालीवाल परिवार ही निभाता है। यह मूर्ति पर्यावरण के अनुकूल होती है, जो रेत और काली मिट्टी से बनाई जाती है। मूर्ति हमेशा एक जैसी ही आकर में बनती है।

गांव गणपति की विसर्जन शोभायात्रा में किसी प्रकार का बैंड या वाद्ययंत्र नहीं बजाया जाता। भजनी मंडल के कलाकार टाळ और मृदंग की थाप पर अभंग गाते हैं। शोभायात्रा के दौरान घर-घर जाकर आरती की जाती है। गांव गणपति की स्थापना श्रीराम मंदिर में ही की जाती है और परंपरा के अनुसार इस वर्ष भी वही किया गया।

पूजा का मान पूर्व सरपंच दिलीप बाविस्कर और सौ. मीराबाई दिलीप बाविस्कर को प्राप्त हुआ। मूर्ति बनाने वाले पाँचवीं पीढ़ी के वारिस श्री नेमीचंद पालीवाल और श्री राजेंद्र जगन्नाथ पालीवाल के घर से गणेश मूर्ति को भजनों और टाळ-मृदंग की गूंज के साथ शोभायात्रा निकालकर श्रीराम मंदिर तक लाया गया।

विसर्जन शोभायात्रा

दसवें दिन अनंत चतुर्दशी को विसर्जन शोभायात्रा निकाली जाती है। उस समय घर-घर की गणेश मूर्तियों को पालखियों में विराजमान किया जाता है और उसके बाद गांव गणपति की विसर्जन यात्रा आरंभ होती है।

मान्यवरों की उपस्थिति

इस वर्ष श्री गणेश जी की स्थापना के अवसर पर श्रीराम मंदिर में उपस्थित रहे –
गांव की लोकनियुक्त सरपंच नर्मदाबाई भिल्ल, उपसरपंच अनिल पाटील, सूतगिरणी संचालक अमृतराव वाघ, क्षेत्रीय माळी समाज सुधारणा मंडल के अध्यक्ष ए. के. गंभीर, पुलिस पाटील जितेंद्र पाटील, पंकज कोली, गांव गणपति अध्यक्ष राजेंद्र महादू महाजन, उपाध्यक्ष राजेंद्र पाटील, सचिव गोपाल महाजन, छोटू पाटील, नेमीचंद पालीवाल, श्रीराम पालीवाल, दिलीप पालीवाल, अजय पालीवाल, योगेश शिंपी, सभी मान्य सदस्य, समाज के गणमान्य नागरिक, वारकरी, भजनी मंडल, फौजी, पत्रकार मंडल तथा सभी श्रद्धालु भक्तगण।

गांव गणपति लासूर का आराध्य देवता और गांव की एकता का प्रतीक है। आने वाले वर्ष में लासूर गांव में सुख, शांति और स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिले, इस प्रार्थना के साथ अध्यक्ष राजेंद्र महादू महाजन ने गणपति समिति की ओर से सभी का स्वागत किया और उत्सव पर्व में सभी भक्तों से सहयोग का आवाहन किया।

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