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श्रीनिवास रामानुजन—जिसने गणित को ईश्वर से जोड़ा.. डॉ.प्रगति जैन

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597

मनावर। जिला धार ।। कभी-कभी इतिहास ऐसे लोगों को जन्म देता है, जो अपने समय से बहुत आगे होते हैं। जिनके लिए ज्ञान केवल बुद्धि का विषय नहीं, बल्कि आस्था, साधना और आत्मा का संवाद होता है। ऐसा ही एक नाम है— श्रीनिवास रामानुजन का है.. उक्त बात प्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ प्रगति जैन ने जन्म जयंती पर व्यक्त करते हुए कहा कि 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में जन्मे रामानुजन किसी बड़े विद्यालय या संपन्न परिवार की देन नहीं थे। उनका संसार छोटा था—एक साधारण घर, सीमित साधन और भीतर जलता हुआ एक असाधारण प्रकाश।

रामानुजन के लिए गणित किताबों में बंद सूत्र नहीं था। वह ईश्वर की भाषा थी। वे स्वयं कहते थे कि उनके कई गणितीय सूत्र उन्हें स्वप्न में देवी नामगिरि द्वारा प्राप्त होते हैं। दुनिया इसे आस्था कहे या कल्पना, लेकिन उसी आस्था से जन्मे सूत्र आज आधुनिक विज्ञान की नींव बने हुए हैं। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि कई बार काग़ज़ तक उपलब्ध नहीं होता। लेकिन गणित रुकता नहीं था।

वे पुराने काग़ज़ों, स्लेट, यहाँ तक कि फर्श पर भी सूत्र लिखते चले जाते। जैसे कोई साधक मंत्र लिख रहा हो, वैसे ही रामानुजन संख्याओं में लीन रहते। विद्यालय में उनकी प्रतिभा सबको चकित करती थी।

गणित में वे अद्भुत थे, लेकिन अन्य विषयों में रुचि नहीं थी। कॉलेज की पढ़ाई अधूरी रह गई। डिग्री नहीं मिली, नौकरी नहीं मिली, और समाज ने उन्हें एक असफल युवक मान लिया। गरीबी, बेरोज़गारी और उपेक्षा के बीच उनका जीवन संघर्षों से भर गया। कई बार भोजन तक का अभाव रहा, लेकिन गणित की साधना कभी नहीं रुकी।रामानुजन के लिए गणित रोज़गार नहीं था— वह प्रार्थना थी, वह श्वास-प्रश्वास थी। 1913 में उन्होंने अपने जीवन का सबसे साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने इंग्लैंड के प्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को एक पत्र लिखा। उस पत्र में दर्जनों ऐसे सूत्र थे, जिन्हें पढ़कर हार्डी चकित रह गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि बिना औपचारिक शिक्षा के कोई व्यक्ति ऐसा कार्य कर सकता है। यही पत्र रामानुजन को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय तक ले गया। भारत का एक गुमनाम युवक अब विश्व के महान गणितज्ञों के बीच था।

नई भाषा, अलग संस्कृति, कठोर मौसम और कमजोर स्वास्थ्य— सब कुछ चुनौतीपूर्ण था। फिर भी रामानुजन का गणित और अधिक गहराता गया। संख्या सिद्धांत, अनंत श्रेणियाँ, टैक्सिकैब संख्या— उनके विचार आज भी सुपरकंप्यूटर, क्रिप्टोग्राफी और अंतरिक्ष विज्ञान में जीवित हैं।

वे ऐसे सूत्र दे गए जिन्हें समझने में दुनिया को दशकों लग गए। 1918 में उन्हें रॉयल सोसाइटी का फेलो बनाया गया । यह सम्मान पाने वाले वे शुरुआती भारतीयों में से थे। लेकिन सफलता के इस शिखर पर उनका शरीर उनका साथ छोड़ने लगा। बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया। मात्र 32 वर्ष की आयु में 1920 में उनका निधन हो गया।

रामानुजन चले गए, लेकिन उनका गणित नहीं गया। आज भी दुनिया भर के गणितज्ञ उनकी नोटबुक्स में नए रहस्य खोज रहे हैं। उनकी “लॉस्ट नोटबुक” आज भी शोध का खजाना मानी जाती है। रामानुजन हमें यह सिखाते हैं कि ज्ञान केवल बुद्धि का विषय नहीं होता, वह आस्था से भी जन्म ले सकता है। डिग्री से बड़ी दृष्टि होती है, संसाधनों से बड़ा संकल्प, और परिस्थितियों से ऊपर विश्वास।

वे केवल गणितज्ञ नहीं थे, वे यह प्रमाण थे कि जब गणित ईश्वर से जुड़ जाए, तो फर्श पर लिखे गए सूत्र भी इतिहास रच देते हैं। यही है रामानुजन की सच्ची विरासत।

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