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कलेक्टर कार्यालय शिफ्टिंग पर ‘श्रेय संग्राम’: काम किसने किया, ढिंढोरा कौन पीट रहा?

कलेक्टर कार्यालय शिफ्टिंग पर ‘श्रेय संग्राम’: काम किसने किया, ढिंढोरा कौन पीट रहा?

संवाददाता धनंजय जोशी

जिला पांढुरना मध्य प्रदेश

पांढुर्णा में कलेक्टर कार्यालय के स्थान परिवर्तन की खबर क्या आई, मानो “श्रेय लेने की प्रतियोगिता” ही शुरू हो गई। राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक—हर कोई खुद को इस फैसले का असली हीरो साबित करने में जुटा हुआ है।
हकीकत पर अगर थोड़ा ठहरकर नजर डाली जाए, तो तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है। अधिकांश संगठनों ने केवल ज्ञापन सौंपकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी, जबकि कुछ सजग लोगों ने प्रस्तावित भूमि के दान को लेकर विधिक नोटिस जारी कर पूरे मामले को कानूनी दायरे में ला खड़ा किया। शासन-प्रशासन ऐसे मामलों में अक्सर जोखिम लेने से बचता है, और शायद यही वजह रही कि स्थान परिवर्तन का निर्णय लेना पड़ा।
मजेदार बात तो यह है कि कुछ संगठन, जो इस पूरे मामले में अब तक “मौन साधना” में लीन थे, अचानक निर्णय के बाद सक्रिय होकर कलेक्टर को बधाई देने पहुंच गए—मानो बिना खेले ही मैच जीत लिया हो!
इधर, कुछ लोगों का दावा है कि उन्होंने भोपाल तक प्रतिनिधिमंडल भेजकर जोरदार विरोध दर्ज कराया। लेकिन यह प्रतिनिधिमंडल कब गया, कहां गया और क्या हुआ—इसकी जानकारी उतनी ही रहस्यमयी है, जितनी “गायब फाइलें” होती हैं। ऐसे में इन दावों पर सवाल उठना लाजिमी है।
जनहित के मुद्दों पर पारदर्शिता सबसे जरूरी होती है, लेकिन यहां तो हाल कुछ ऐसा है कि “काम कम, प्रचार ज्यादा” नजर आ रहा है। जनता भी अब समझने लगी है कि असली मेहनत किसने की और मंच पर ताली कौन बटोर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम पर एक कहावत एकदम सटीक बैठती है—
“जंगल में मोर नाचा, किसने देखा… और यहां तो हर कोई खुद को मोर बता रहा है!”

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