
बौद्धिक दिव्यांगजनों के अभिभावकों को मिली लीगल गार्जियनशिप,कलेक्टर की अध्यक्षता में जिला लोकल लेवल कमेटी की बैठक संपन्न
संवाददाता धनंजय जोशी
जिला पांढुरना मध्य प्रदेश
नेशनल ट्रस्ट एक्ट के तहत संपत्ति और सुरक्षा के लिए प्रदान की गई कानूनी अभिभावकत्व
पांढुरना – कलेक्टर कार्यालय के सभाकक्ष में आज सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग की जिला लोकल लेवल कमेटी की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। कलेक्टर श्री नीरज कुमार वशिष्ठ की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में जिले के दो बौद्धिक दिव्यांगजनों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में अहम निर्णय लिया गया। समिति द्वारा विस्तृत विचार-विमर्श के पश्चात संबंधित दिव्यांगजनों के अभिभावकों को आधिकारिक रूप से लीगल गार्जियनशिप (कानूनी अभिभावकत्व) प्रदान करने की प्रक्रिया पूर्ण की गई।

बैठक में अपर कलेक्टर श्री नीलमणि अग्निहोत्री, संयुक्त कलेक्टर सुश्री मेघा शर्मा एवं डिप्टी कलेक्टर सुश्री प्रेक्षा पाठक, सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग की प्रभारी उपसंचालक श्रीमती राजनंदनी सिंह ठाकुर, समिति सदस्य सिविल सर्जन डॉ. सुशील दुबे, ग्रामीण आदिवासी समाज विकास संस्थान के निदेशक श्री विजय धवले, समग्र सामाजिक सुरक्षा अधिकारी श्री अनिल कड़वे, जिला दिव्यांग पुनर्वास केंद्र के प्रशासनिक अधिकारी श्री पंचलाल चंद्रवंशी, वरिष्ठ अधिवक्ता श्री संजीव ठाकरे, दिव्यांग प्रतिनिधि सुश्री हर्षा हिवसे तथा जिला दिव्यांग पुनर्वास केंद्र की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. नम्रता सूर्यवंशी उपस्थित रहे।
बैठक के दौरान अधिकारियों ने इस कानूनी प्रावधान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 की धारा 14(1)(2)(3) के अंतर्गत ऐसे वयस्क दिव्यांगजन, जो बौद्धिक अक्षमता, सेरेब्रल पाल्सी, ऑटिज्म या बहु-दिव्यांगता से प्रभावित होते हैं, उनकी देखभाल तथा संपत्ति की सुरक्षा के लिए कानूनी अभिभावक नियुक्त करना आवश्यक होता है। यह प्रमाण पत्र जिला कलेक्टर द्वारा जारी किया जाता है, जिसके माध्यम से दिव्यांग व्यक्ति के माता-पिता, भाई-बहन अथवा निकटतम रिश्तेदार को उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए अधिकृत किया जाता है।
चर्चा के दौरान कलेक्टर श्री वशिष्ठ ने निर्देश दिए कि लीगल गार्जियनशिप की प्रक्रिया केवल कागजी औपचारिकता तक सीमित न रहे, बल्कि संबंधित हितग्राहियों का समय-समय पर भौतिक सत्यापन भी किया जाए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दिव्यांगजनों को सुरक्षित और अनुकूल वातावरण प्राप्त हो रहा है। साथ ही उन्होंने अधिकारियों को इस व्यवस्था का व्यापक प्रचार-प्रसार करने के निर्देश दिए, ताकि जिले के अन्य पात्र परिवार भी इसका लाभ उठा सकें और दिव्यांगजनों के साथ होने वाले संभावित दुर्व्यवहार अथवा संपत्ति संबंधी विवादों को रोका जा सके।
इस पहल से दिव्यांगजनों के परिजनों को एक मजबूत कानूनी सहारा मिला है, जिससे वे भविष्य में अपने बच्चों के हितों और अधिकारों की रक्षा अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेंगे।