मध्यप्रदेश

कटनी–मैहर सीमा पर खनन का काला खेल: कौन बचा रहा है माफिया को? किसकी चुप्पी से छलनी हो रही धरती

बिका हुआ सिस्टम दे रहा अवैध को वैध का सर्टिफिकेट पैसो के बलबूते चल रहा अवैध कारोबार

कटनी–मैहर सीमा पर खनन का काला खेल: कौन बचा रहा है माफिया को? किसकी चुप्पी से छलनी हो रही धरती

बिका हुआ सिस्टम दे रहा अवैध को वैध का सर्टिफिकेट पैसो के बलबूते चल रहा अवैध कारोबार

 

कटनी जिले की सीमा से सटे मैहर जिले के भटूरा क्षेत्र में चल रहा अवैध खनन अब केवल स्थानीय चिंता नहीं रहा बल्कि यह प्रशासनिक निगरानी राजनीतिक संरक्षण और विभागीय जिम्मेदारी पर सीधा सवाल बन चुका है। ज़मीनी हालात इशारा कर रहे हैं कि यह महज चोरी-छिपे किया गया खनन नहीं बल्कि एक संगठित नेटवर्क के सहारे चल रहा कारोबार है। सूत्रों के अनुसार, भटूरा और आसपास के इलाकों में भारी मशीनों से चूना पत्थर का अवैध उत्खनन लंबे समय से जारी है। नियमों के अनुसार जहां सीमित खुदाई और सुरक्षा मानकों का पालन अनिवार्य है। वहां खदानों को इस कदर खोखला किया जा रहा है कि वे जानलेवा गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं। यह स्थिति न केवल पर्यावरण के लिए घातक है बल्कि क्षेत्र में बड़े हादसे की आशंका भी बढ़ा रही है।
कलेक्टर के निर्देश बेअसर, विभागीय कार्रवाई नदारद
सूत्र के अनुसार कलेक्टर स्तर से निर्देश जारी होने के बावजूद अवैध उत्खनन पर प्रभावी रोक नहीं लग सकी है। ऐसे में खनिज वन और राजस्व विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।क्या यह लापरवाही है या फिर किसी अदृश्य संरक्षण का नतीजा? कलेक्टर दिखावा कर रहे है या फिर अपनी जेब भरने के इरादे से नोटिस का खेल रहे हैं। खदान का अधिक हिस्सा कटनी जिले की सीमा पर है। अंदाजा लगाया जा रहा है कि कलेक्टर की छुट अगर न मिली तो राजस्व विभाग व मार्निंग तथा अंय विभाग इस तरह की लापरवाही नही बरतते।
खदान किसी के नाम, संचालन किसी और के हाथ
ग्रामीणों का आरोप है कि भटूरा में के.के. गौतम के नाम से दर्ज खदान का संचालन कथित तौर पर कटनी के एक खनिज व्यापारी द्वारा किया जा रहा है। चर्चा यह भी है कि उक्त व्यापारी कांग्रेस से जुड़ा हुआ बताया जाता है। जानकारी तो यह भी आ रही है की यह व्यापारी कभी एक बडे उद्योगपति नेता की जी हजूरी करते करते लम्बी रकम हजम कर अमीर बना है। यह कहना गलत नही होगा की घर मे घर दारी कर नौकर भी अमीर बन है यही कारण है की पिछते वक्त मे अमीर जनप्रतिनिधि से जुडकर ही लोगों के सम्पर्क मे आया और राजनीतिक रसूख के चलते कार्रवाई से बचता आ रहा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अगर सब कुछ वैध है तो पारदर्शिता क्यों नहीं?
टीपी घोटाला: कागज कहीं और, पत्थर कहीं और
सूत्रों का दावा है कि अवैध खनन में 180 रुपये प्रति टन टीपी का खेल चल रहा है। आरोप है कि पत्थर अवैध खदानों से लोड किया जाता है। जबकि टीपी बंद या निष्क्रिय खदानों से जारी कराई जाती है। इस कथित नेटवर्क में टीपी दलाल ट्रांसपोर्टर और खदान संचालक शामिल बताए जा रहे हैं। गंभीर आरोप यह भी हैं कि माइनिंग इंस्पेक्टर मौके पर टीपी की भौतिक जांच नहीं करते जिससे यह पूरा सिस्टम बिना रोक-टोक चलता रहता है।
सीमेंट प्लांट्स तक रोज़ाना 2 हजार टन पत्थर, रिकॉर्ड कहां हैं?
सूत्रों के मुताबिक मैहर के सीमेंट प्लांट्स में एक ही खदान से प्रतिदिन करीब 2 हजार टन चूना पत्थर भेजा जा रहा है।
यदि यह खनन वैध है तो सवाल उठते हैं क्या इतनी मात्रा की स्वीकृति दस्तावेज़ों में दर्ज है?उत्पादन परिवहन और टीपी का आपसी मिलान क्यों नहीं दिखता?अवैध ब्लास्टिंग और विस्फोटकों का बड़ा सवाल खनन के दौरान अवैध ब्लास्टिंग की भी शिकायतें सामने आ रही हैं। नियमों के तहत विस्फोटक सीमित मात्रा में और लाइसेंस के आधार पर ही उपलब्ध होते हैं।
तो फिर इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री आखिर आ कहां से रही है?क्या विस्फोटक नियंत्रण विभाग ने इसकी कभी जांच की?
पर्यावरण और राजस्व, दोनों की भारी कीमत
इस अवैध खनन से सरकार को लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान जलस्तर में गिरावट पहाड़ों की संरचना कमजोर होने और स्थानीय पर्यावरण को दीर्घकालिक क्षति हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
अब प्रशासन से सीधे सवाल
अवैध खनन की संयुक्त विभागीय जांच कब होगी? टीपी जारी करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई?सीमेंट प्लांट्स में पहुंच रहे पत्थर का सोर्स ऑडिट कब होगा? अवैध ब्लास्टिंग और विस्फोटकों की आपूर्ति की जांच कौन करेगा? स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों ने मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए चाहे वे कितने ही प्रभावशाली क्यों न हों। फिलहाल इस गंभीर मामले में संबंधित विभागों और खदान संचालकों का पक्ष सामने आना शेष है।प्रशासन की प्रतिक्रिया मिलते ही उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।यह रिपोर्ट जारी रहेगी…क्योंकि सवाल सिर्फ खनन का नहीं
धरती कानून और भविष्य की सुरक्षा का है।

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