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जूता नही न्याय पर प्रहार

जब धर्मांधता अदालत की चौखट तक पहुंच गई

 

“जूता नहीं, न्याय पर प्रहार”

— जब धर्मांधता अदालत की चौखट तक पहुंच गई

सुप्रीम कोर्ट — वह स्थान जहां संविधान की आत्मा सांस लेती है, वहां सोमवार को एक ऐसी घटना घटी जिसने न केवल न्यायपालिका की गरिमा पर प्रश्नचिन्ह लगाया, बल्कि यह भी दिखा दिया कि नफ़रत का संक्रमण अब संस्थाओं तक पहुंच चुका है।

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मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर एक वकील द्वारा जूता उछालने की कोशिश, सिर्फ एक क्षणिक उन्माद नहीं, बल्कि उस गहरी मानसिकता का प्रतिबिंब है। जिसने धर्म, जाति और राजनीति को न्याय से ऊपर रख दिया है।

🔸 नारा जो सब कह गया :

वकील राकेश किशोर को सुरक्षा कर्मियों ने समय रहते रोक लिया, पर इससे पहले वह नारा लगा चुका था — “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे।”
यह नारा केवल किसी देवता की रक्षा की पुकार नहीं थी, यह एक विचार की घोषणा थी — कि अब धर्म संविधान से बड़ा है, और “आस्था” न्याय से अधिक पवित्र।

संविधान की प्रस्तावना में लिखा “We, the people of India.”
अब कुछ लोगों के लिए बदल चुका है — “We, the believers of one faith.”

🔸 पृष्ठभूमि और शक की परतें :

कहा जा रहा है कि यह घटना खजुराहो मंदिर मामले से जुड़ी हो सकती है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने भगवान विष्णु की मूर्ति पुनर्स्थापना की याचिका को खारिज किया था। संभव है कि हमलावर उस फ़ैसले से आहत हो।

पर यह भी संयोग नहीं कि मुख्य न्यायाधीश गवई
दलित समुदाय से आने वाले दूसरे और पहले बौद्ध मुख्य न्यायाधीश हैं। एक ऐसे समय में जब सत्ता के शीर्ष पर “हिंदुत्व” विचारधारा छाई हो, उनका अस्तित्व ही शायद कई लोगों को असहज करता है।

🔸 धर्म और संविधान का द्वंद्व :

भारत आज एक गहरे द्वंद्व से गुजर रहा है — “धर्म बनाम संविधान।”
पहले धर्म निजी आस्था था, अब वह सार्वजनिक पहचान है। पहले संविधान शासन का मार्गदर्शक था, अब वह राजनीतिक सुविधा का दस्तावेज़ बनता जा रहा है।

जब पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ मंदिरों में गणेश पूजा करते हुए प्रधानमंत्री के साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं, तो समाज यह संदेश ग्रहण करता है कि न्याय भी अब श्रद्धा के तराजू पर तोला जा सकता है।

🔸 सामाजिक चेतना का क्षरण :

यह घटना महज कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है। यह उस सामाजिक पतन का प्रतीक है, जहां नफ़रत अब संस्कार बन चुकी है।

पहले नफ़रत छिपी रहती थी, अब वह गर्व से प्रदर्शित होती है। “गर्व से कहो हम हिंदू हैं” — यह नारा अब केवल धार्मिक नहीं, राजनीतिक आस्था का प्रमाणपत्र है।

राहुल गांधी की कही बात — “नफ़रत का कैरोसिन देश में फैला दिया गया है”। अब एक चेतावनी नहीं, बल्कि रिपोर्ट की तरह प्रतीत होती है।

🔸 दलित और अल्पसंख्यक : दोहराया जा रहा इतिहास

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सही कहा — “दलित और अल्पसंख्यक होना इस देश में अब गुनाह बना दिया गया है।”

एनसीआरबी के आँकड़े इस कथन को पुष्ट करते हैं।
दलितों, मुसलमानों, आदिवासियों और स्त्रियों के खिलाफ अपराध घट नहीं रहे — वे अब औचित्य के तर्कों के साथ बढ़ रहे हैं।

कहीं “सनातन की रक्षा” के नाम पर हत्या होती है,
कहीं “राष्ट्रवाद” के नाम पर लिंचिंग को मौन स्वीकृति दी जाती है। संविधान अब इन सबके बीच एक मौन ग्रंथ बन गया है — जिसकी बातें केवल भाषणों में दोहराई जाती हैं।

🔸 संघ और मनुवादी राष्ट्र की परियोजना

आरएसएस की भाषा में “एकता” का अर्थ “समानता” नहीं, बल्कि श्रेष्ठता की करुणा है। वे एक ऐसा भारत चाहते हैं, जहां दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाएं सिर्फ “सहन” कर सकें, समान अधिकार की मांग न करें।

मोहन भागवत “सबको साथ लेकर चलने” की बात करते हैं, परंतु वह साथ “समानता के स्तर पर नहीं”, “श्रृंखला के नीचे वाले पायदान” पर दिया जाता है।

मुख्य न्यायाधीश पर जूता नहीं उछाला गया, बल्कि संविधान की आत्मा पर फेंका गया। यह जूता एक संकेत है — कि अगर समाज अब भी नहीं जागा, तो आने वाले वर्षों में अदालतें भी मंदिरों और मंचों की तरह नारेबाज़ी के अखाड़े बन जाएंगी।

हमें यह तय करना होगा — हमें मनुस्मृति वाला भारत चाहिए या संविधान वाला भारत। और यह निर्णय न्यायालय नहीं, हमारे अंदर का नागरिक करेगा।

“जब न्याय की कुर्सी पर धर्म बैठ जाए, तो संविधान केवल एक पवित्र ग्रंथ नहीं — बल्कि मौन शहीद बन जाता है।”

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