

हमीरपुर से ब्यूरो चीफ़ राजकुमार की रिपोर्ट
राठ हमीरपुर।देश की नींव मजबूत करने में अहम भूमिका निभाने वाली आंगनबाड़ी कार्यकत्री एवं सहायिकाएं आज खुद असुरक्षित भविष्य की मार झेल रही हैं।
जनपद हमीरपुर के सरीला, गोहांड और राठ की आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं ने अपनी मांगो को लेकर प्रधानमंत्री को सम्बोधित ज्ञापन उपजिलाधिकारी राठ को सौंपा है। देशहित में कार्य करने वाली इन मेहनतकश महिला कर्मियों का न वर्तमान सुरक्षित है, न भविष्य। विडंबना यह है कि सरकार जिन हाथों से देश का भविष्य गढ़ रही है, उन्हीं हाथों को आज भी सम्मानजनक अधिकारों से वंचित रखा गया है।
बेहद कम मानदेय, कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं
वर्तमान में भारत सरकार द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को मात्र ₹4500 प्रतिमाह और सहायिकाओं को ₹2200 प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है। यह मानदेय न तो महंगाई के अनुरूप है और न ही न्यूनतम मजदूरी के करीब।
कई राज्यों में राज्य सरकारें अतिरिक्त मानदेय देती हैं, लेकिन केंद्र स्तर पर मानदेय का संशोधन 5 वर्ष में केवल एक बार किया जाता है।
इन कर्मियों को महंगाई भत्ता, वार्षिक वेतन वृद्धि, पेंशन, भविष्य निधि, ग्रेच्युटी और स्वास्थ्य सुविधाएं जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं मिलतीं।
केंद्र सरकार द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं को आज भी मानसेवी बताकर नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया गया है, जबकि चयन प्रक्रिया, योग्यता, सेवा शर्तें, अनुशासनात्मक कार्रवाई और सेवानिवृत्ति से जुड़े सभी नियम केंद्र सरकार स्वयं तय करती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति इन्हें स्थायी नौकरी से वंचित रखने की एक सोची-समझी नीति का हिस्सा है। 25 अप्रैल 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां एवं सहायिकाएं ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम के अंतर्गत ग्रेच्युटी पाने की हकदार हैं।
लेकिन लगभग तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी यह निर्णय देश में कहीं लागू नहीं किया गया, जो सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है।
इसके अलावा सिविल अपील संख्या 3153 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आंगनबाड़ी कर्मी न तो स्वयंसेवी हैं और न ही मानसेवी, बल्कि वे सरकार की प्रत्यक्ष कर्मचारी हैं। न्यायालय ने उन्हें नियमित कर स्थायी नौकरी, वेतनमान, भत्ते और सामाजिक सुरक्षा देने की बात कही थी।
