

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। जिला धार।। नगर में रंगो का महापर्व होली को लेकर उत्साह चरम पर है। प्रति वर्षानुसार इस वर्ष भी जगह जगह होलिका दहन किया जाएगा। परंपरानुसार होलिका का पूजन किया जाएगा। पिछले कुछ वर्षों से पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी
जागरूकता बड़ी है। लकड़ी के बजाय गोबर के कण्डों की होली का की परंपरा को निरंतर बढ़ावा मिल रहा है।
इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता प्रसिद्ध लेखक संजय वर्मा दृष्टि ने कहा कि कंडे की होली जलाएं जिससे लाखों गायों का सालभर का आहार का खर्च निकल सकता है। ये कार्य पर्यावरण के हक़ में एवं गो सेवा के लिए पुनीत कार्य होगा। साथ ही बिना पत्तियों के वृक्षों को बेजान समझकर होली के लिए ना काटें| होलिका दहन हेतु गौशाला में गोकाष्ट विक्रय सेंटर स्थापित किए जाना चाहिए ताकि कंडों से होलिका दहन कर पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके। गोकाष्ट से होने वाली आय गाय के आहार हेतु अतिरिक्त रूप में मददगार बन सके। सिर्फ कंडे से होली दहन हेतु संकल्प लेवे ताकि पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके। कंडो से निर्मित होली के लिए सामग्री में एक ये भी होती है जिन्हें बरगुलिया, बर्बुले,भरभोलिए के नाम से जाना जाता है। गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। होली पूजन के समय होली पर चढ़ाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। भारतीय जन मानस व संस्कृति में गाय के गोबर का अपना विशेष महत्व है। होली पर भी इसका महत्व देखने को मिलता है। वही प्रसाद में माजम, हार कंगन जो शक्कर से निर्मित होते है। बाजारों में खूब बिकते है। बड़े सुंदर बने होते है। इन्हें देखकर राहगीरों के पग रुक जाते है। वे इसके बारे में दुकानदार से जरूर पूछते है क्योकि ये साल भर में होली के समय ही दिखते और बिकते है। मोहल्लों में कई स्थानों पर होली दहन किया जाने लगा है। सुझाव है कि यदि होली दहन एक ही स्थान पर किया जाए तो पर्यावरण के पक्ष में ज्यादा उपयोगी होगा। अतः बिना पत्तियों के वृक्षो को बेजान समझकर होली के लिए ना काटे। कंडे की होली दहन हेतु संकल्प लेवे ताकि पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके।