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बुद्विमान को बताने के जरूरत नही है

बेवकूफ को बताने से कोई फायदा नही है

एक 12 तेरह साल का बच्चा उसकी माँ दो महीने से बीमार है बिस्तर पर है वो घर से बाहर भी नही निकल रही है वह बच्चा एक सुबह उठता है तो देखता है कि मौसम बड़ा सुंदर सुहाना है चारो तरफ हरियाली है फूल खिले हुए है पक्षियां हवा का झोखा बहुत स्फूर्ति का एहसास करा रहा ओस के बूंद फूलो के पत्तो पर चमक रहे है और सूर्य की लालिमा दिन के उजाले को प्रकाशित कर रहीहै अचानक उस बच्चे के मन मे कुछ ख्याल आया और वो भागा भागा घर के अंदर गया और एक पेटी बक्सा उठा कर लाया और उसमें सुबह की सूर्य की किरण हवा हरियाली रौशनी शीत सब को पेटी में बंद कर लिया और अपनी माँ के पास गया
माँ से बोला कि माँ तुम दो महीने घर से बाहर नही निकली हो आज मौसम बड़ा सुहावना है मैंने अपने पेटी में बाहर के सारे मौसम हवा रौशनी प्रकाश शीतलता को इस पेटी में तुम्हारे लिए बंद करके लाया हूं क्या तुम देखोगी
उसकी माँ अपने बेटे को अल्पक देखने लगी और बोली ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई हवा सूर्य की प्रकाश ओष की बूंद और पर्यावरण को पेटी में भर ले दिखा तो जरा मैं भी देखु क्या लाया है मेरा लाल मेरे लिए वह बच्चा बहुत उत्त्साह और खुशी पूर्वक अपनी पेटी खोलता है अपनी माँ को चमत्कृत करने के लिए पर यह क्या उसके पेटी में तो कुछ था ही नही सिवाय अंधकार के वह बच्चा मायूस होकर अवाक रह जाता है उसके आँख में आँशु आ जाते है वह रोना सा चेहरा बना कर अपनी माँ से कहता है अपनी माँ से की मैंने बंद किया था माँ पर पता नही कंहा गायब हो गया
उस बच्चे को यह पता ही नही है कि जिसे वो अपनी पेटी में भर कर अपनी मां को दिखाना चाहता है उसे पेटी में भरने का कोई उपाय नही है मनुष्यो ने भी बड़े बड़े शब्दो के पेटियों को तैयार किया है और बडे मेहनत और श्रम से तैयार किया है जिन लोगो ने भी ईश्वर खुदा या परमात्मा को अनुभव किया है वे सभी दयालु लोग अपने अपने शब्दों की पेंटिया तैयार किया है किताब के रूप में की मैंने जो देखा और जाना है उससे पूरी दुनिया को अवगत करा दु पूरी दुनिया को बता दु की ईश्वर या खुदा या गॉड कैसा है उन लेखकों नवियो की करुणा है इसके पीछे की जो मैंने जाना है अब वह पूरी मानव जाति जान ले मगर अफसोस कि जब भी उन शब्दों की पेंटिया को खोली जाती है तो वहां केवल शब्द ही होते है कोरे शब्द उसमें ईश्वर नही होता है खलीया कारतूस की तरह इसलिए नही की ईश्वर नही है बल्कि इसलिए कि ईश्वर इतना विराट और अदभुत है कि उसे शब्दो मे बांधने का कोई उपाय ही नही है मौन में तो उसे महसूस किया जा सकता है शून्य में तो उन्हें जाना जा सकता है परंतु शब्दो के द्वारा ईश्वर को अभिब्यक्त करने का कोई राह ही नही है और यही कारण है कि दुनिया भर में सारे ग्रंथो को जब भी पढ़ा जाता है तो उसमें ईश्वर की जगह कुछ और ही बाते सामने आने लगती है और यही कारण है कि बुद्ध जैसे ही ज्ञान को उपलब्ध हुए बुद्ध मौन हो गए उन्होंने मौन धारण कर लिए थे इसलिए कि वो समझ गए थे कि
जो जानता है उसे बताने की कोई जरूरत नही है और जो नही जानता है उसे भी बताने से कोई फायदा नही है
अर्थात बुद्धिमान को बताने की कोई जरूरत नही और बेबकुफ़ को बताने से कोई फायदा नही है
इसलिए ज्ञान प्राप्त होते ही बुद्ध मौन धारण कर लिए थे
मुफ़्ती साहब बोलते जा रहे है बोलते जा रहे है जावेद अख्तर साहब को कुछ समझ मे ही नही आ रहा है इसलिए नही की ईश्वर नही है बल्कि इसलिए की शब्दो के माध्यम से ईश्वर को अभी ब्यक्त करने की कोई राह नही है अनुभव और मौन ही एक मात्र रास्ता है अतःमौन
याद रहे ईश्वर अपने सारे कार्य मौन होकर ही अंजाम देता है
रवि कुमार

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