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नर्मदा परिक्रमा यात्रा नहीं जीवन जीने की साधना है-दादा गुरु निराहारी संत दादा गुरु पहुंचे मांडू बड़ी संख्या में पहुंचे भक्त जगह-जगह हुआ स्वागत

नर्मदा परिक्रमा यात्रा नहीं जीवन जीने की साधना है-दादा गुरु
निराहारी संत दादा गुरु पहुंचे मांडू बड़ी संख्या में पहुंचे भक्त जगह-जगह हुआ स्वागत
राहुल सेन मांडव
मो 9669141814
मांडू न्यूज/.हमारा जीवन, धर्म और संस्कृति सब प्रकृति पर केंद्रित है। प्रकृति भाव प्रधान है। नर्मदा परिक्रमा हमारे लिए कोई यात्रा नहीं बल्कि जीवन जीने की साधना है। एक ऐसी साधना जो सनातन धर्म की संस्कृति को प्रकट करती है। दुनिया के लिए वह नदि है पर हमारे लिए शक्ति है।
यह बात निराहारी संत दादा गुरु ने पर्यटन नगरी मांडू में प्रवेश के दौरान पत्रकार राहुल सेन मांडव से चर्चा में कहीं। आगे चर्चा में उन्होंने कहा कि दुनिया मां नर्मदा को नदी के रूप में देखती है पर हमारी संस्कृति के अनुसार हम उसे शक्ति और भगवती के रूप में देखते हैं। यह प्रत्यक्ष शक्ति है जिस पर हमारा धर्म संस्कृति सब केंद्रित है। हमारी साधना उन्हें पर समर्पित है। हम सभी को अपनी धर्म और संस्कृति पर गर्व करना चाहिए और उसके अनुरूप हो जीवन में आचरण करना चाहिए। यह प्रकृति जो हमें जीवन देती है उसके संरक्षण के लिए हमें शपथ लेनी चाहिए। प्रकृति की रक्षा करने के साथ हमें जीवन पर्यंत पौधारोपण को अपनी आदत बनाना चाहिए।
सनातन धर्म ने विश्व को सिखाई जीने की कला संत दादा गुरु ने चर्चा में आगे कहा कि हमारे देश की सनातन संस्कृति अद्भुत है और पूरा विश्व हमारी संस्कृति से प्रभावित है। सनातन धर्म और संस्कृति ने पूरे विश्व को जीने की कला सिखाई है। सनातन धर्म वर्तमान दौर में भी प्रासंगिक है। मां नर्मदा हमारी जीवन रेखा है।
सद्धालुओं के साथ पर्यटकों ने भी लिया गया गुरु का आशीर्वाद नर्मदा परिक्रमा करते हुवे कालीबावड़ी से तारापुर घाट क्षेत्र होते हुए दादा गुरुदेव संत जनों के साथ दोपहर 4 बजे मांडू पहुंचे। इस दौरान उनके भक्तों और श्रद्धालुओं ने पलक पांवड़े बिछाकर उनका स्वागत किया। मार्ग में परिक्रमा के दौरान उन्हेंनि जगह जगह पौधों का वितरण किया और लोगों को पौधारोपण करने की प्रेरणा दी। मांडू
पहुंचने पर उन्होंने सोनगढ़ गेट पर विश्राम कर श्रद्धालुओं से चर्चा की उसके बाद नीलकंठ महादेव मंदिर का जलाभिषेक किया और फिर उन्होंने नगर में भ्रमण कर चतुर्भुज श्री राम मंदिर मांडू में पूजन किया। वही रात्री में दादा गुरुदेव के द्वारा प्रवचन दिया गया जिसमें दादा गुरुदेव द्वारा कहा गया कि नर्मदा परिक्रमा करते हे तो पूरी नर्मदा परिक्रमा सिर्फ दो कुंड मिलते हे एक कुंड जहा से मां नर्मदा रेवा के नाम से निकली वह अमरकंठ स्थान ओर दूसरा मांडू है जहां पर रेवा कुंड कहते है वैसे ही पूरी नर्मदा यात्रा के दौरान आप मांडू पहुंचे ते हैं दो एक कुंड यहां भी है जिसे रेवा कुंड कहते है जबतक आप नर्मदा परिक्रमा के दौरान अगर दोनों कुंड के दर्शन नहीं करते हैं तो आपकी नर्मदा यात्रा पूरी नहीं होगी वहीं मांडू जो है यह विध्याचल पर्वत पर स्थापित है मांडू की स्थापना। मार्कण्डेय ऋषि द्वारा की गई
मुनि मार्कण्डेय ऋषि को हुई थी नर्मदा परिक्रमा सबसे पहले मुनि मार्कण्डेय के द्वारा की गई थी वही मांडू जो है वह आनंद की नगरी है यहां साक्षात भगवान शिव विराजमान हैं भगवान शिव कहा होते है वहा आनंद ही आनंद होता है यहां पर भगवान शिव साक्षात रहते है और उनकी शिवलिंग पर हमेशा ही जल की धारा से अभिषेक होता जाता है वही यहा पर वनवासी चतुर्भुज श्री राम भी विराजमान है जो सदियों से मांडू में विराजमान है चतुर्भुज श्री राम ने जब रुक्मणी जी का जन्म हुआ था उस समय चतुर्भुज श्रीराम वनवासी राम के रूप में आकर दर्शन दिए और माता रूक्मणी का नामकरण क्या मांडू में आज कल लोग पांच सो साल का इतिहास देखते हैं लेकिन यह का इतिहास पांच सो वर्ष का इतिहास नहीं हजारों वर्ष का इतिहास है लेकिन यहां का इतिहास भगवान राम के समय से है भगवान कृष्ण के समय से है.

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