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बिहार का मौसमी प्रवासन

संकट की गहराई और समाधान की आवश्यकता

बिहार का मौसमी प्रवासन—संकट की गहराई और समाधान की आवश्यकता

पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परामर्श ने बिहार से होने वाले मौसमी प्रवासन (Seasonal Migration) की भयावहता और जटिलताओं को न केवल सामने लाया है, बल्कि इसके समाधान के लिए एक संयुक्त रणनीति की तात्कालिक आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया है।

## प्रवासन की विशालता: रोजगार का गहरा अभाव

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ के पूर्व निदेशक पुष्पेंद्र कुमार द्वारा प्रस्तुत आँकड़े स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। बिहार के 63 लाख से अधिक श्रमिक प्रवासी के रूप में काम कर रहे हैं। इनमें से केवल 25% ही राज्य के भीतर कार्यरत हैं, जबकि एक बड़ा हिस्सा (71%) देश के अन्य राज्यों में और 3% से अधिक श्रमिक विदेशों में रोज़गार की तलाश में जाते हैं।

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यह विभाजन स्पष्ट रूप से बताता है कि राज्य में पर्याप्त और स्थायी रोज़गार के अवसरों का गहरा अभाव है, जिसके कारण कार्यशील जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा गरिमापूर्ण जीवन की तलाश में अपने घर-बार छोड़ने को मजबूर है। यह स्थिति बिहार के मानव पूंजी बहिर्वाह (Human Capital Outflow) के संकट को उजागर करती है।

## सरकारी योजनाएँ बनाम ज़मीनी हकीकत

श्रम संसाधन विभाग द्वारा कल्याणकारी योजनाओं, रजिस्ट्रेशन और राहत उपायों की जानकारी देना सराहनीय है, लेकिन ज़मीनी कार्यकर्ताओं और यूनियन नेताओं की प्रतिक्रियाएं सरकारी दावों और वास्तविक लाभ के बीच की खाई को स्पष्ट करती हैं।

राजस्थान और केरल जैसे राज्यों से आए यूनियन नेताओं ने मजदूरी, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में आ रही जटिल अंतरराज्यीय चुनौतियों को साझा किया। यह दर्शाता है कि योजनाएँ भले ही बन गई हों, लेकिन उनका क्रियान्वयन, पोर्टेबिलिटी और प्रभावी वितरण अभी भी एक बड़ी चुनौती है। जब तक प्रवासी श्रमिकों को गंतव्य राज्यों में सुरक्षा और न्यूनतम मजदूरी की गारंटी नहीं मिलती, तब तक उनके अधिकार केवल कागजों तक ही सीमित रहेंगे।

## बाल श्रम और मानव तस्करी का काला सच

प्रवासन से जुड़ा एक और भयावह पहलू बाल श्रम और मानव तस्करी का बढ़ता जोखिम है। ईंट-भट्टों, छोटे कारखानों और घरेलू कामकाज में फँसे बच्चों के मामले एक सामाजिक कलंक हैं। राज्य बाल अधिकार आयोग और यूनिसेफ जैसे संगठनों के बचाव और पुनर्वास के प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह समस्या कड़ी निगरानी और अंतरराज्यीय समन्वय के बिना नियंत्रित नहीं हो सकती। प्रवासन का दबाव परिवारों को अपने बच्चों को जोखिम भरी परिस्थितियों में धकेलने पर मजबूर करता है।

## आगे की रणनीति: कल्याण से विकास तक

विशेषज्ञों ने सही निष्कर्ष निकाला है कि केवल कल्याणकारी योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। प्रवासन को नियंत्रित करने के लिए मूल कारणों को संबोधित करना होगा:

1. स्थानीय रोज़गार सृजन: गाँवों में कृषि-आधारित उद्योगों, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को मज़बूत करना।
2. कौशल विकास: श्रमिकों को बाज़ार की माँग के अनुरूप कौशल प्रदान करना ताकि उनकी आय बढ़े।
3. पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा: प्रवासी श्रमिकों की सटीक डेटा-बेसिंग करना और यह सुनिश्चित करना कि उन्हें स्वास्थ्य, पेंशन और बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ गंतव्य राज्य में भी मिल सके।
4. अंतरराज्यीय समन्वय: बाल श्रम और मानव तस्करी पर रोक लगाने तथा श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए विभिन्न राज्यों के श्रम विभागों और पुलिस बलों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना।

यह राष्ट्रीय परामर्श बिहार और देश के लिए एक वेक-अप कॉल है। 63 लाख से अधिक श्रमिकों का पलायन केवल एक संख्या नहीं है; यह एक राष्ट्रीय संकट है जो आर्थिक अवसरों की कमी और सामाजिक सुरक्षा की विफलता को दर्शाता है। अब समय आ गया है कि सरकारें केवल कागजी योजनाओं पर ध्यान केंद्रित न करें, बल्कि जमीन पर प्रभावी सुधारों को लागू करें ताकि हर श्रमिक को अपने घर और राज्य में सम्मान और सुरक्षा के साथ काम करने का अवसर मिल सके।

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