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हम भारतीय नहीं हैं, ऐसा प्रमाणपत्र दें

किसानों का आवेदन

चोपड़ा (अनिलकुमार पालीवाल)

राज्य के नुकसानग्रस्त किसानों के लिए 35,000 करोड़ रुपये का राहत पैकेज घोषित किया गया, परंतु उस सूची में पहले शामिल किए गए चोपड़ा तालुका को मात्र दो घंटे में ही बाहर कर दिया गया। सरकार ने यह निर्णय किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किए बिना लिया। जब यह गलती ध्यान में आई, तब भी उसे सुधारने के बजाय यह घोषित कर दिया कि चोपड़ा तालुका में सूखा नहीं है, इसलिए न कोई मदत, न कोई पंचनामा। सरकार यह सब जानबूझकर कर रही है। शायद उन्हें यहाँ के किसान भारतीय नहीं लगते!

 

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अगर ऐसा है, तो सरकार को चाहिए कि वह हमें “आप भारत के नागरिक नहीं हैं” यह प्रमाणपत्र देकर यहाँ से निकाल दे। इस आशय का एक औपचारिक आवेदन आज एस.बी. पाटील द्वारा प्रशासन को सौंपा गया।

 

प्रशासन का लक्ष वेधून दिलाते हुए सांगितले गेले की—

चोपड़ा तालुका में कुल 64,000 हेक्टेयर कृषि योग्य जमीन है, जिसमें से केवल 7,000–8,000 हेक्टेयर पर केला और लगभग 700 हेक्टेयर पर गन्ना लगाया जाता है। अर्थात लगभग 55,000 हेक्टेयर भूमि पर कपास, मक्का, उडद और मूंग की खेती होती है।

 

जब कपास फूल की अवस्था में था और मक्का दाने बनने की प्रक्रिया में था, तभी 15 दिनों का बारिश का अंतराल पड़ा, जिससे भारी नुकसान हुआ जो अब किसी तरह पूरा नहीं हो सकता। कपास को सिंचाई की सुविधा होते हुए भी उस समय पानी नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि अगर बोरवेल का पानी भरने के बाद बारिश आ जाती तो पूरा फूल झड़ जाता और केवल हरे पत्ते ही रह जाते। इसलिए खेती पूरी तरह बारिश की नियमितता पर निर्भर रहती है।

 

इसी प्रकार, तोड़ाई के समय भारी वर्षा और लगातार एक महीने तक बादल छाए रहने से कपास के बोंड नहीं खुले और उनमें बोंड अळी जैसे कीटों का प्रकोप हुआ — यह सरकार को कौन समझाए?

 

साथ ही, अक्टूबर महीने में लगातार नौ दिन की बेमौसम बारिश से कपास पूरी तरह काला पड़ गया, सरकी (कपास की नमी व रेशेदार परत) सड़ गई — जिससे कपास का वजन और भाव दोनों ही घट गए। मक्का भी सड़ गया। सरकार यह बताए कि आखिर उत्पादन कहाँ हुआ? — ऐसा तीखा सवाल आज किसानों ने प्रशासन से पूछा।

 

केवल झूठी घोषणाएँ कर, वास्तविक नुकसान की भरपाई न करनी पड़े इसलिए अगर प्रशासन जानबूझकर गलत रिपोर्ट दे रहा है, तो उसे सीधे यह कहना चाहिए कि “आप भारत के नागरिक नहीं हैं” — और उसका प्रमाणपत्र हमें दे देना चाहिए, ताकि “ना रहेगा बाँस, ना बजेगी बाँसुरी”।

ऐसी तीव्र भावना किसानों ने इस अवसर पर व्यक्त की।

 

निवेदन तहसीलदार भाऊसाहेब थोरात ने स्वीकार किया।

इस दौरान एस.बी. पाटील, डॉ. सुभाष देसाई, डॉ. रविंद्र निकम, भगवान पाटील, कुलदीप पाटील, अजय पाटील, मोहन पाटील, सतीश पाटील, चंद्रकांत पाटील, नारायण पाटील सहित असंख्य किसान उपस्थित थे।

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