

धनबाद के कतरास स्थित छाताबाद में हुआ भीषण भू-धसान केवल जमीन का धंसना नहीं था, बल्कि यह उस व्यवस्था, उस लालच और उस सामूहिक चुप्पी का भयावह परिणाम है, जिसने वर्षों से इस त्रासदी को जन्म लेने दिया। मंगलवार को अचानक धरती फटी, कई घरों में गहरी दरारें पड़ गईं, परिवार बेघर हो गए, बच्चों की आंखों में दहशत उतर आई और लोगों की वर्षों की मेहनत कुछ ही पलों में मलबे में बदल गई।हादसे के बाद आक्रोशित ग्रामीण पूरे दिन सड़क पर बैठे रहे। शाम को कतरास थाना में प्रशासन, बीसीसीएल और जनप्रतिनिधियों के साथ त्रिपक्षीय वार्ता हुई। बैठक में बीसीसीएल ने शिफ्टिंग के लिए ₹50 हजार, बाद में ₹1.5 लाख, बेलगढ़िया में दो क्वार्टर और भू-धसान क्षेत्र में भराई का आश्वासन दिया। प्रशासन ने भी सरकारी पुनर्वास नीति के तहत कार्रवाई की बात कही। लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वहीं खड़ा है—क्या कुछ लाख रुपये उन टूटे घरों, बिखरे सपनों और लोगों के मन में बैठ चुके डर की भरपाई कर सकते हैं?असल सवाल मुआवजे का नहीं, बल्कि उस अपराध का है जो वर्षों से लोगों की आंखों के सामने होता रहा। जब घरों के नीचे अवैध सुरंगें खोदी जा रही थीं, तब जिम्मेदार विभाग कहां थे? जब कोयले के लालच में धरती को भीतर से खोखला किया जा रहा था, तब किसने आवाज उठाई? जब कुछ लोग चंद पैसों के लिए अपने ही भविष्य की नींव खोद रहे थे, तब समाज क्यों चुप था? और जब पूरे इलाके में अवैध खनन की चर्चा आम थी, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई?आज हालात यह हैं कि लोग अपने ही घरों में रहने से डर रहे हैं। दीवारों में पड़ी दरारें केवल ईंट-पत्थर की नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था पर लोगों के भरोसे में पड़ी दरारें हैं। मासूम बच्चे रात भर सहमे हुए हैं, बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे बैठने को मजबूर हैं और परिवार यह सोचकर कांप रहे हैं कि अगला भू-धसान कहीं उनके घर के नीचे तो नहीं होगा।यह हादसा प्राकृतिक आपदा नहीं कहा जा सकता। यह वर्षों की लापरवाही, भ्रष्ट तंत्र, अवैध खनन और हमारी सामूहिक चुप्पी का नतीजा है। अगर आज भी अवैध खनन पर पूरी तरह रोक नहीं लगी, दोषियों को कठोर सजा नहीं मिली और समाज ने भी ऐसे अपराधों के खिलाफ खुलकर आवाज नहीं उठाई, तो छाताबाद जैसी त्रासदियां केवल खबर नहीं रहेंगी, बल्कि पूरे धनबाद के भविष्य पर एक भयावह चेतावनी बन जाएंगी।यह रिपोर्ट किसी एक व्यक्ति या संस्था पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम और समाज से एक सीधा सवाल पूछती है—क्या हम अगली त्रासदी का इंतजार करेंगे, या फिर इस बार सच में कार्रवाई होगी?क्योंकि अगली बार शायद सिर्फ घर नहीं धंसेंगे… इंसानियत भी मलबे में दब जाएगी।Article अच्छा लगे तो लाइक करे