

हमीरपुर से ब्यूरो चीफ राजकुमार की रिपोर्ट
मौदहा, हमीरपुर। आधुनिकता के दौर में जहां शादियां डीजे, बैंड-बाजे और चमक-दमक के बीच संपन्न होती हैं, वहीं मौदहा क्षेत्र में एक अनूठी पहल ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। यहां करीब 30 वर्षों से बंद पड़ी बैलगाड़ी से बारात निकालने की परंपरा को फिर से जीवित किया गया, जिसने पूरे क्षेत्र में चर्चा बटोरी।
थाना मौदहा क्षेत्र के अंतिम गांव गुढा निवासी जागेंद्र द्विवेदी के पुत्र मोहित द्विवेदी की शादी भेड़ी जलालपुर निवासी मोहिनी पाठक के साथ 25 फरवरी को संपन्न हुई। इस विवाह की खास बात यह रही कि बारात पूरी तरह पारंपरिक अंदाज में निकाली गई। सजी-धजी 25 बैलगाड़ियों में करीब 200 बाराती सवार होकर खेतों के रास्ते लगभग तीन किलोमीटर का सफर तय करते हुए फार्म हाउस पहुंचे।
बिना किसी शोर-शराबे और आडंबर के यह बारात ग्रामीण संस्कृति की जीवंत मिसाल बनी। विवाह स्थल पर कठघोड़वा नृत्य और लौंडा नाच जैसे पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिसने माहौल को और भी सांस्कृतिक बना दिया।
पत्तल में परोसा गया देशी भोजन
इस विवाह समारोह में भोजन व्यवस्था भी पूरी तरह पारंपरिक रही। मेहमानों को पत्तल में बैठाकर सम्मानपूर्वक भोजन कराया गया। खाने में कद्दू, आलू-बैंगन की सब्जी सहित अन्य देसी व्यंजन परोसे गए। तबोरा भजन और महिलाओं द्वारा गाए गए बुंदेलखंडी गीत इस आयोजन का मुख्य आकर्षण रहे।
विवाह की रस्में तीन दिनों तक चलीं, जिसमें तिलक, द्वारचार और विदाई की परंपराएं निभाई गईं। खास बात यह रही कि 26 फरवरी को दुल्हन की विदाई भी बैलगाड़ी से ही की गई, जो सभी के लिए यादगार पल बन गया।
परंपरा और प्रकृति को प्राथमिकता
दूल्हे के पिता जागेंद्र द्विवेदी, जो जैविक खेती करते हैं, ने बताया कि वे आधुनिक तरीके से भी शादी कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी परंपराओं को प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि किसान जीवन में गाय और बैलों का विशेष महत्व है, इसलिए इस शुभ अवसर पर उन्हें सम्मान देना जरूरी समझा गया। उन्होंने यह भी बताया कि विवाह स्थल पर न बिजली थी और न ही पक्की सड़क, फिर भी ग्रामीण संस्कृति को महत्व दिया गया।
वहीं दुल्हन के पिता विवेक पाठक ने कहा कि बुजुर्गों से मिली परंपराओं को निभाना ही इस आयोजन का उद्देश्य था। उन्होंने आधुनिक बफे सिस्टम की तुलना में पारंपरिक भोजन व्यवस्था को अधिक सम्मानजनक और कम अपव्ययी बताया।
इस अनूठी बारात को देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। बुजुर्गों ने इसे पुराने समय की याद बताया, जबकि युवाओं के लिए यह एक नया और रोमांचक अनुभव रहा। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसी पहलें नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं।