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महात्मा बुद्ध शांति और अहिंसा के अग्रदूत

महात्मा बुद्ध शांति और अहिंसा के अग्रदूत   (रघुवीर सिंह पंवार)

भारत भूमि देवो की भूमि है यह बात सारे संसार को विदित है | इस पावन धरा पर कई तेजस्वी ,प्रतापी ,सत्यवादी महापुरुषों ने अवतरित होकर इस वसुंधरा को पावन किया |इस भूमि का कण –कण पवित्र है  | एसा कहा गया हें ,चंदन हें इस देश की माटी तपोभूमि हर गांव हें इस देश की माटी की मिट्टी भी ललाट पे लगाई जाती है | एसी भारत भूमि पर गौतम बुद्ध शांति और अहिंसा के अग्रदूत बनकर अवतरित हुवे | महात्मा बुद्ध जब इस भूमि पर आये  उस समय सम्पूर्ण भारत देश अशांति ,हिंसा , अधर्म ,अंधविश्वास और कई प्रकार की कुरीतियों से ग्रस्त  था |

महात्मा बुद्ध का आगमन एक ऐसे युग प्रवर्तक रूप में हुआ ,जिन्होंने न भारतवर्ष अपितु संसार के अनेक राष्ट्रों में अपने ज्ञान के प्रकाश पुंज से संसार वासियों के मन में ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित  की व जनमानस को  ज्ञान का पान कराया  |

महात्मा बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था  |उन्हें गौतम बुद्ध के नाम से भी जाना जाता था |उनका गौतम नाम उनकी गोत्र के नाम से रखा गया था | उनका जन्म  क्षत्रिय कुल के राजा सुद्धोदन  के यंहा सन 569 ईसवी पूर्व लुम्बनी नामक स्थान पर हुवा था | उनकी माता का नाम महामाया था |महारानी महामाया पुत्र जन्म के सातदिन बाद ही इस संसार को छोड़ कर परमपिता  को प्यारी हो गई | सिद्धार्थ का लालन –पालन उनकी माँ की बड़ी बहन  गौतमी ने किया  | ज्योतिषियों ने बालक सिद्धार्थ की जन्मपत्रिका का गहन अध्यन कर भविष्यवाणी की थी की यह तेजस्वी बालक बड़ा होकर या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या तपस्या के उपरांत महान संत , संत बनाने की बात सुनकर पिता चिंतित हो गए | उन्होंने बालक के लिए राजमहल में  आमोद ,प्रमोद के सभी साधनों की व्यवस्था  कर दी |बचपन से ही सिद्धार्थ करुणायुक्त ,अत्यंत गंभीर व शांत विचारो के थे | उनकी जानने की इच्छा प्रबल थी | वे जिज्ञासु थे , अपने आसपास होने वाली घटनाओ का वे गहन अवलोकन करते थे |राजमहल के ठाट –बाट उन्हें रास नहीं आते थे |बड़े होने पर भी उनकी प्रवर्ती नहीं बदली | पिता ने उनकी शादी एक सुन्दर  कन्या  से कर डी जिसका नाम यशोधरा था |उनको एक पुत्र रत्न प्राप्त हुवा जिसका नाम राहुल रखा गया ,परन्तु सिद्धार्थ का मन गृहस्थी में नहीं रमा |

एक दिन व भ्रमण के लिए निकले । रास्ते में रोगी वृद्ध और मृतक को देखा तो  जीवन की सच्चाई का पता चला । क्या मनुष्य की यही गति है, यह सोचकर वे बेचैन हो उठे । फिर एक रात्रिकाल में जब महल में सभी सो रहे थे सिद्धार्थ चुपके से उठे और पत्नी एव बच्चों को सोता छोड़ वन को चल दिए।

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उन्होंने वन में कठोर तपस्या आरंभ की । तपस्या से उनका शरीर दुर्बल हो गया परंतु मन को शांति नहीं मिली । तब उन्होंने कठोर तपस्या छोड्‌कर मध्यम मार्ग चुना । अंत में वे बिहार के गया नामक स्थान पर पहुँचे और एक पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बैठ गए । एक दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई । वे सिद्धार्थ से ‘ बुद्ध ‘ बन गए । वह पेड़ ‘ बोधिवृक्ष ‘ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध सारनाथ पहुंचे । सारनाथ में उन्होंने शिष्यों को पहला उपदेश दिया । उपदेश देने का यह क्रम आजीवन जारी रहा । इसके लिए उन्होंने देश का भ्रमण किया । एक बार वे कपिलवस्तु भी गए जहाँ पत्नी यशोधरा ने उन्हें पुत्र राहुल को भिक्षा के रूप में दे दिया । अस्सी वर्ष की आयु में गौतम बुद्ध निर्वाण को प्राप्त हुए ।

बुद्ध के उपदेशों का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा । अनेक राजा और आम नागरिक बुद्ध के अनुयायी बन गए । उनके अनुयायी बौद्ध कहलाए । बौद्ध धर्म को अशोक, कनिष्क तथा हर्ष जैसे राजाओं का आश्रय प्राप्त हुआ । इन राजाओं ने बौद्ध धर्म को श्रीलंका, बर्मा, सुमात्रा, जावा, चीन, जापान, तिब्बत आदि देशों में फैलाया ।

भगवान बुद्ध

 

 

भगवान बुद्ध के  विचार—

सभी गलत कार्य की नींव मन से होता है यदि मन परिवर्तित और पवित्र हो जाए तो गलत कार्य नहीं रह सकता है

क्रोध के लिए सजा नहीं मिलती बल्कि अपने क्रोध से की गयी गलती के लिए सजा मिलती है.

घृणा को घृणा से खत्म नहीं किया जा सकता है बल्कि इसे प्रेम से ही खत्म किया जा सकता है जो की एक प्राकृतिक सत्य है

जो बीत गया उसमे नही उलझना चाहिए और ना ही भविष्य को लेकर ज्यादा चिंतित रहना चाहिए बल्कि हमे वर्तमान में ही जीना चाहिए यही ख़ुशी से जीने का रास्ता है.

आपके पास जो कुछ भी है है उसे बढ़ा-चढ़ा कर मत बताइए, और ना ही दूसरों से ईर्ष्या कीजिये. जो दूसरों से ईर्ष्या करता है उसे मन की शांति नहीं मिलती

सत्य के मार्ग पे चलते हुए कोई दो ही गलतियाँ कर सकता है; पूरा रास्ता ना तय करना, और इसकी शुरआत ही ना करना.

ख़ुशी अपने पास बहुत अधिक होने के बारे में नहीं है. ख़ुशी बहुत अधिक देने के बारे में है.

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