मुख्य समाचार पर जाएँ
LIVE NEWSROOM
BREAKING
हेडलाइन: हावड़ा के बिस्कुट गोदाम में मिली ‘निर्मल बांग्ला’ योजना की बाल्टियां, एक हिरासत मेंसेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत एकलव्य विद्यालय में विद्यार्थियों से भाजपा पदाधिकारियों ने किया संवादलिलुआ में पर्युषण महापर्व के षष्ठम दिवस पर भव्य भक्ति संध्या का आयोजन, सुप्रसिद्ध युवा गायक वाशु सिपानी ने भजनों से बांधा समां, श्रद्धालु हुए भावविभोरप्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजनापं. दीनदयाल उपाध्याय जयंती पर भाजपा जिला कार्यालय में हुआ कार्यक्रमभारत देश का पहला इलेक्ट्रो होम्योपैथी नेचरोपैथी हॉस्पिटल जिस का बहुत बड़ा दावा अगर रोग मरीज का ठीक ना हो तो इलाज का पूरा पैसा वापिसश्राद्ध पक्ष में दीवारों पर सजती है संजा माता….तालुका खटाव निमसोड देव नगर गणेश उत्सव सत्कार समारंभअनंत चतुर्दशी पर शिशु मंदिर में गजानन को दी अश्रुपूर्ण विदाईमनावर के हक की लड़ाई को मिली नई मजबूती…हेडलाइन: हावड़ा के बिस्कुट गोदाम में मिली ‘निर्मल बांग्ला’ योजना की बाल्टियां, एक हिरासत मेंसेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत एकलव्य विद्यालय में विद्यार्थियों से भाजपा पदाधिकारियों ने किया संवादलिलुआ में पर्युषण महापर्व के षष्ठम दिवस पर भव्य भक्ति संध्या का आयोजन, सुप्रसिद्ध युवा गायक वाशु सिपानी ने भजनों से बांधा समां, श्रद्धालु हुए भावविभोरप्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजनापं. दीनदयाल उपाध्याय जयंती पर भाजपा जिला कार्यालय में हुआ कार्यक्रमभारत देश का पहला इलेक्ट्रो होम्योपैथी नेचरोपैथी हॉस्पिटल जिस का बहुत बड़ा दावा अगर रोग मरीज का ठीक ना हो तो इलाज का पूरा पैसा वापिसश्राद्ध पक्ष में दीवारों पर सजती है संजा माता….तालुका खटाव निमसोड देव नगर गणेश उत्सव सत्कार समारंभअनंत चतुर्दशी पर शिशु मंदिर में गजानन को दी अश्रुपूर्ण विदाईमनावर के हक की लड़ाई को मिली नई मजबूती…
Dharधार्मिकमध्य प्रदेश

श्राद्ध पक्ष में दीवारों पर सजती है संजा माता….

श्राद्ध पक्ष में दीवारों पर सजती है संजा माता 16 दिन तक गूंजते हैं निमाड़ी_मालवी लोकगीत... बेटियों को सिखाती है प्रेम-एकता और लोककला की पाठशाला.. रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo…

श्राद्ध पक्ष में दीवारों पर सजती है संजा माता….
WhatsApp Facebook

श्राद्ध पक्ष में दीवारों पर सजती है संजा माता

16 दिन तक गूंजते हैं निमाड़ी_मालवी लोकगीत… बेटियों को सिखाती है प्रेम-एकता और लोककला की पाठशाला..

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597

मनावर। जिला धार।। श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों में मालवा-निमाड़ सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों में घरों की दीवारें संजा माता की कलाकृतियों से सज उठती हैं। कुंवारी कन्याएं गोबर, फूल-पत्तियों और रंगीन कागज से प्रतिदिन अलग-अलग आकृतियां बनाकर संजा माता को सजाती हैं। शाम होते ही घर-घर मालवी लोकगीतों की मधुर स्वरलहरियां गूंजती हैं। संजा केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि बेटियों के लिए कला, संस्कार, प्रकृति और आपसी प्रेम सीखने की अनूठी पाठशाला भी है।

संजा पर्व में हर दिन बनने वाली कलाकृति का अपना अलग महत्व है। पूनम का पाटला, एकम की छाबड़ी, बीज का बिजोरा, तीज का तीजों, चौथ का चोपड़, पंचम का पांच कटोरा, छठ का छह पंखुड़ियों वाला फूल, सातम का स्वस्तिक-सातिया, अष्टमी का आठ पंखुड़ियों वाला फूल, नवमी का डोकरा-डोकरी, दशमी का दीपक या निसरनी, ग्यारस का केल, बारस का पंखा, तेरस का घोड़ा और चतुर्दशी से पूनम तक कला कोट जैसी आकृतियां बनाई जाती हैं। अंतिम दिनों में फूल-पत्तियों और रंगीन कागज से सजाया गया किला कोट विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।

*गीतों में मालवी मिठास, निमाड़ी तेज.. रिश्तों और संस्कारों की झलक*

संजा के साथ गाए जाने वाले लोकगीत इस परंपरा की सबसे बड़ी पहचान हैं। “काजल टिकी लेव भाई…”, “संजा तू थारा घरे जा…”, “नानी सी गाड़ी लुढ़कती जाए”, “संजा बाई का सासरे जावंगा” जैसे गीतों में मालवी मिठास के साथ हास्य, श्रृंगार, रिश्तों और सामाजिक जीवन की झलक दिखाई देती है। बड़ी लड़कियां छोटी बच्चियों को गीत और संजा बनाने की कला सिखाती हैं। एक सहेली के घर संजा गीत गाने के बाद सभी लड़कियां मनुहार करते हुए दूसरी सहेली के घर जाती हैं। इससे आपसी मेलजोल और आत्मीयता बढ़ती है।
संजा की आरती के बाद प्रसाद बांटने की परंपरा भी रोचक है। प्रसाद को ढंककर रख दिया जाता है और उसका नाम पूछते हुए गीत-परंपरा निभाई जाती है। सही उत्तर मिलने के बाद प्रसाद वितरित किया जाता है। इन छोटी-छोटी परंपराओं में लोकजीवन की सहजता और हास्य का रंग दिखाई देता है।

*आधुनिकता के दौर में कागज तक सिमटी संजा*

बदलते समय के साथ संजा का पारंपरिक स्वरूप भी बदल रहा है। शहरों में सीमेंट की इमारतें, महंगे पेंट, गोबर और प्राकृतिक सामग्री की कमी, बेटियों का एक स्थान पर एकत्रित न हो पाना, पढ़ाई का बढ़ता दबाव तथा टीवी और इंटरनेट के प्रभाव के कारण संजा मनाने की परंपरा कमजोर हुई है। अब कई स्थानों पर गोबर और फूल-पत्तियों की जगह रंगीन कागज से संजा बनाने का चलन बढ़ रहा है।

इसके बावजूद गांव और देहातों में यह परंपरा आज भी जीवंत है। पेड़ों की पत्तियां, तरह-तरह के फूल, गोबर और प्राकृतिक सामग्री आसानी से उपलब्ध होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में संजा का उत्साह देखने को मिलता है। हालांकि बेटियों की संख्या कम होने और बदलती जीवनशैली का असर इस लोकपर्व पर भी दिखाई देने लगा है।

*बेटी की विदाई जैसा भावुक होता है संजा का विसर्जन*

संजा की विदाई का दृश्य भावुक कर देने वाला होता है। 16 दिनों तक संजा के साथ जुड़ी रहने वाली बेटियां विसर्जन के समय भावुक हो जाती हैं। ऐसा लगता है मानो घर की बेटी की ही विदाई हो रही हो। जिन गांवों में नदी होती है, वहां संजा को तगारी या टोपले में रखकर नदी किनारे ले जाया जाता है और विसर्जित किया जाता है। प्राकृतिक सामग्री से बनी संजा का विसर्जन पर्यावरण की दृष्टि से भी अनुकूल माना जाता है।

विसर्जन के बाद खाली तगारियों और टोपलों को नदी किनारे एक-दूसरे के ऊपर रखकर लड़कियां उनके ऊपर से कूदती हैं। यह दृश्य मानो वियोग के बीच खुशी तलाशने की परंपरा को दर्शाता है। विवाह के बाद भी संजा से जुड़ी बचपन की यादें बेटियों के मन में वर्षों तक ताजा रहती हैं।

*लोककला के साथ प्रकृति से जोड़ती है संजा*

संजा पर्व पशु-पक्षियों, फूल-पत्तियों और प्राकृतिक आकृतियों को दीवारों पर उकेरने के माध्यम से बच्चों को कला और अपने परिवेश से जोड़ता है।

मालवा-निमाड़ के अलावा राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा और ब्रज क्षेत्र में भी यह परंपरा अलग-अलग नामों और स्वरूपों में दिखाई देती है। श्राद्ध पक्ष में कुंवारी कन्याओं द्वारा मां पार्वती की पूजा कर मनोवांछित वर की कामना करने की परंपरा भी इससे जुड़ी मानी जाती है।
आज जरूरत इस बात की है कि संजा जैसी लोककलाओं को केवल पर्व तक सीमित न रखकर नई पीढ़ी से जोड़ा जाए। लोकगीतों, प्राकृतिक कलाकृतियों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के माध्यम से संजा प्रेम, एकता, सामंजस्य और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है। उज्जैन में संजा उत्सव के दौरान संजा पुरस्कार और महाकालेश्वर में प्रतिवर्ष आयोजित उमा-साझी महोत्सव जैसे प्रयास भी इस लोकपरंपरा को संरक्षित करने की दिशा में किए जा रहे हैं।

संजा इसलिए खास है कि यह बेटियों को कला सिखाने के साथ प्रकृति, लोकसंस्कृति, रिश्तों और आपसी प्रेम से जोड़ती है। बदलते दौर में इस लोकपर्व को बचाना हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाने जैसा है।