*हजारों परिवारों की सिसकियों के बीच कतरास कोयलांचल में फिर गूंजा विस्थापन का दर्द*
*स्थानीय लोगों का आरोप—अवैध खनन और अंधाधुंध पिलर कटाई ने छीना सबकुछ*
धनबाद/कतरास। तिनका-तिनका जोड़कर, पाई-पाई बचाकर और जिंदगी भर की मेहनत लगाकर जिन गरीब परिवारों ने अपना आशियाना खड़ा किया था, बुधवार को वही घर उनकी आंखों के सामने जमीन में समाते नजर आए। कतरास थाना क्षेत्र के छाताबाद में एक बार फिर भू-धंसान की घटना ने पूरे इलाके को दहला दिया।
बताया जा रहा है कि छाताबाद में यह तीसरी बड़ी भू-धंसान की घटना है। घटना के बाद कई घर प्रभावित हुए और लोग अपने घरों से सामान निकालने के लिए जान जोखिम में डालते नजर आए। किसी को बच्चों की चिंता थी तो कोई बक्सा, बर्तन और जरूरी सामान बचाने में जुटा था।
एक तरफ जमीन धंस रही थी, दूसरी तरफ लोग अपने जीवन की बची-खुची पूंजी समेट रहे थे।
मौके के हालात बेहद भयावह थे। प्रभावित परिवारों के बीच अफरा-तफरी और चीख-पुकार का माहौल रहा। स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में लंबे समय से हो रहे अवैध खनन और भूमिगत पिलर कटाई ने जमीन को कमजोर कर दिया है। हालांकि भू-धंसान के वास्तविक कारणों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
*रोते परिवार, बिखरे सपने और टूटता आशियाना*
जिन दीवारों को खड़ा करने में परिवारों की पूरी जिंदगी की कमाई लगी, वही दीवारें कुछ ही पलों में मलबे में बदल गईं। महिलाएं रोती रहीं, बच्चे सहमे रहे और परिवार अपने सामान को सुरक्षित जगह पहुंचाने की जद्दोजहद करते रहे।
लोगों का कहना है कि उन्हें सबसे ज्यादा डर इस बात का है कि अगला नंबर किस घर का होगा।
*कई परिवारों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल है—घर बचाएं या जान*
स्थानीय लोगों में आक्रोश भी देखने को मिला। उनका आरोप है कि अवैध कोयला कारोबार और खनन की कीमत आम गरीब परिवार चुका रहे हैं। लोगों ने गुस्से में कहा कि जिन लोगों ने कोयले के लिए जमीन को खोखला किया, उन्होंने उनका घर और उनका भविष्य छीन लिया।
*फिर सामने आया विस्थापन का दर्द*
कतरास कोयलांचल में विस्थापन कोई नया शब्द नहीं है। लेकिन जब किसी परिवार को अपनी आंखों के सामने अपना घर टूटता दिखाई दे, तो विस्थापन सिर्फ जमीन छोड़ना नहीं रहता—यह वर्षों की यादों, मेहनत और सपनों से अलग होने का दर्द बन जाता है।
7 अगस्त की घटना के बाद भी क्षेत्र में आंदोलन और मुआवजे को लेकर आवाज उठी थी। प्रभावित लोगों के बीच आज भी शिकायत है कि उन्हें पर्याप्त राहत और मुआवजा नहीं मिला। कुछ लोगों का कहना है कि “मुआवजे के नाम पर जीरो मिला, कुछ नहीं मिला।”
अब वही परिवार फिर पूछ रहे हैं—अगर घर ही नहीं बचा तो आखिर जाएं कहां?
*प्रशासनिक व्यवस्था पर भी उठे सवाल*
घटना के दौरान प्रभावित परिवारों को खुद ही अपने सामान और जान की सुरक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ा। लोगों का कहना है कि संकट की घड़ी में उन्हें तत्काल राहत, सुरक्षित स्थान और प्रभावी रेस्क्यू व्यवस्था की जरूरत थी।
भू-धंसान जैसी घटनाओं के प्रभावित परिवारों की मांग है कि घटना की तकनीकी जांच कर वास्तविक कारण सामने लाया जाए और खतरे वाले इलाकों में रहने वाले परिवारों के लिए सुरक्षित पुनर्वास तथा उचित मुआवजे की व्यवस्था की जाए।
*क्या सचमुच कतरास की जमीन अंतिम विदाई की ओर?*
आज छाताबाद में धंसी जमीन सिर्फ एक भू-धंसान की घटना नहीं दिखी। यह उन परिवारों की कहानी है, जो वर्षों से कोयलांचल की जमीन पर अपना जीवन बिता रहे हैं और अब उसी जमीन के असुरक्षित होने के कारण अपना घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
तस्वीरें सवाल पूछ रही हैं—किसकी कीमत पर निकलेगा कोयला और किसके हिस्से आएगा उजड़ा हुआ आशियाना?
छाताबाद में आज मलबे के बीच सिर्फ मकान नहीं टूटे, बल्कि कई परिवारों के भविष्य और उम्मीदों पर भी संकट गहरा गया।
कतरास की धरती से उठती सिसकियां अब एक ही सवाल कर रही हैं—आखिर कब रुकेगा यह सिलसिला?
