संवाददाता निलेश कलसकर अखंड भारत न्यूज़ पांढुरना
सौंसर / हाल ही के दिनों में देश भर में गरीबों और जरूरतमंदों को दी जाने वाली मुफ्त योजनाओं को लेकर तीखी बहस छिडी है।अक्सर तर्क दिया जाता है कि,इस प्रकार की योजनाएं लोगों की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है और इन्हें राजनीति लाभ या चुनावी वैतरणी पार करने का माध्यम माना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन योजनाओं से वित्तीय प्रबंधन पर चिंता जताई है।
नागरिक अधिकार सुरक्षा परिषद मध्यप्रदेश के अध्यक्ष एवं क्रांतिकारी कवि एस.आर.शेंडे ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि, आजादी के 79 वर्षों बाद भी आम आदमी गरीबी,भुखमरी,बेरोजगारी,संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। गरीबों को मुफ्त में मिल रही योजनाओं का विरोध एसी में रहने व भरे पेट वाले लोग कर रहे है।
वें सुदूर ग्रामीणअंचलों एवं शहरी स्लम एरिया में झाँककर देखे,आम आदमी अभावों में कितनी जिल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। सरकार गरीबों को पाँच किलो राशन देकर कोई उपकार नहीं करती।
उधर गोदामों में प्रति वर्ष लाखों टन अनाज सडकर बर्बाद होता है। नुमाईंदों के मित्रों,बडे कारपोरेट के अरबों के कर्ज माफ किये जाते है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार कारपोरेट ऋण राइट ऑफ -देश के बैंकों ने आम आदमी की गाढी कमाई के ओधोगिक घरानों के लगभग 9 . 87 लाख करोड़ बट्टे खाते में डाले हैं।
विधायकों,सांसदों को आजीवन पेंशन व अन्य मुफ्त सुविधाएं दी जाती है। इधर देश का किसान ,मजदूर,युवा बाढ सूखा,फसल की बर्बादी ,कर्ज का बोझ,बेरोजगारी से आत्महत्या करने मजबूर है।
एस.आर.शेंडे ने सरकार एवं संबंधित संस्थाओं से अनुरोध किया है कि,लोगों को केवल खैराती या कर्जदार समझने के बजाय उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिये मजबूत अर्थव्यवस्था ,संसाधन,आय के साधन ,कुटीर उद्योग और रोजगारोन्मुखी नीतियों की जरूरत है। जब तक देश में आर्थिक खाई नहीं पाटी जाती, तबतक जरूरतमंदों को शिक्षा,स्वास्थ आदि कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित करना नैतिक और संवैधानिक दायित्व है।
चूंकि,देश का हर नागरिक तरह तरह का टैक्स देता है। अन्त में-
मंदिर मस्जिद के बहसों से जरा बाहर निकलकर,
पहले ये ढूँढो कि इस दौर में इंसान कौन है,
गरीबों की चौखट पर सिसकती है भूख रात भर,
कोई जाकर पूछें कि पडौस में परेशान कौन है।
