संवाददाता निलेश कलसकर अखंड भारत न्यूज़ पांढुरना
पांढुर्णा। महाराष्ट्र में सूखा घोषित करने की चर्चा के बीच पांढुर्णा जिले में हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक बनते जा रहे हैं। इस वर्ष पिछले वर्ष से बहुत कम वर्षा हुई है। आसमान ने साथ नहीं दिया और धरती प्यासी रह गई।
क्षेत्र के सभी डैम खाली पड़े हैं, नदियां और नाले बिना बहे सूखे पड़े हैं। खेतों में दरारें पड़ गई हैं, किसानों की खड़ी फसलें दम तोड़ रही हैं। भूजल स्तर बिल्कुल नहीं बढ़ा है। विशेषज्ञों की मानें तो आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह होगी। गांव-गांव में हेडपंप सूखेंगे, ट्यूबवेल जवाब दे जाएंगे और पीने के पानी के लिए भारी संकट खड़ा होगा।
किसानों में भारी आक्रोश और चिंता है। गांव के चौपालों से लेकर खेतों की मेड़ों तक एक ही चर्चा है – पांढुर्णा को सूखा प्रभावित घोषित किया जाना चाहिए। हालांकि अभी तक शासन-प्रशासन को कोई लिखित आवेदन नहीं दिया गया है, लेकिन किसानों का दर्द उबल रहा है। किसान अपनी फसलों को लेकर रात-दिन चिंतित और परेशान हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सूखे की मांग वहां से उठ रही है, जहां पानी की कोई कमी नहीं है। जहां बड़ी-बड़ी नदियां बह रही हैं, जहां रेत का अवैध व्यापार, भंडारण और डंपरों से दिन-रात परिवहन जारी है, जहां बड़े-बड़े कारखाने धड़ल्ले से चल रहे हैं। वहां सूखा कैसा?
जबकि पांढुर्णा तहसील का किसान सच में सूखे की मार झेल रहा है। उसके खेत सूख रहे हैं, उसके घर का घड़ा खाली होने की कगार पर है।
अब किसानों ने सभी दलों के नेताओं और जनप्रतिनिधियों को ललकारा है – मतभेद भुलाओ, एक मंच पर आओ और किसानों के हक के लिए आवाज उठाओ।
अगर किसान जीवित रहता है, तो कृषि जीवित रहेगी, और अगर कृषि जीवित रहती है, तो गांव जीवित रहेगा!
