बड़वानी। निमाड़ आंचल
संज्ञा सिर्फ भित्ति चित्र नहीं है मालवा निमाड़ की हर बेटी की भावना हे।
पितृपक्ष के पहले दिन से कुंवारी कन्याएं अपने घर की बाहरी दीवार को गोबर से लिपती, है
उस पर फूल पत्ती कांच की चूड़ियां के टुकड़े और आजकल रंग बिरंगे पन्नी से रोज एक नया रूप बनाती है
कभी संज्ञा का किला कभी चांद सूरज कभी गणेश जी। 16दिन,16, संघर
रोज शाम को शैहालिया एक साथ आती है संज्ञा के सामने गोल घेरा बनाकर यहीं गीत गाती है।
सांझ बाई का लाडा जी लुगला लाया जाड़ा जी
आंसुओं कई लाया दारिका लाता गोट किनारी का,
छोटी छोटी छोरी घणो इतराओ
कहते है संज्ञा पार्वती का ही रूप हे। जैशे पार्वती ने शिव को पाने
के लिये तप किया, वैसे ही निमाड़ की बेटी अच्छे
जीवन साथी ओर सुखी संसार के लिए 16दिन,तक, संजा की
पूजा करती है।
अंत में बिदाई जब सांझ को दीवार से निकल कर नदी में विसर्जित किया जाता है तो बिटिया की आंखों म आशु होते हैं जैशे अपनी सखी को सुश्राल बजेते हे विदा कर रही है जैशे
सांझ तो चली सुसराल
आजकी जरूरत
मोबाइल ओर सोशल मीडिया के दौर, में ये परम् परा धीरे धीरे लुप्त होरही है बड़वानी जैशे आदिवासी अंचल में अब भी ये सच्चे रूपमें बची है हमें इसे बचाना होगा
जय संज्ञा माता