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रक्षाबंधन पर सूनी रह गईं भाजपा परिवार की कलाइयां, कार्यकर्ताओं का सवाल—‘भैया-बहन, इस बार हमें क्यों भूल गए?’

राखी का धागा टूटा या अपनत्व की डोर? रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597 मनावर। जिला धार।। रक्षाबंधन का त्योहार आया, राखियां भी सजीं और मिठाइयां भी बंटी, लेकिन मनावर के भाजपा…

रक्षाबंधन पर सूनी रह गईं भाजपा परिवार की कलाइयां, कार्यकर्ताओं का सवाल—‘भैया-बहन, इस बार हमें क्यों भूल गए?’
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राखी का धागा टूटा या अपनत्व की डोर?

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597

मनावर। जिला धार।। रक्षाबंधन का त्योहार आया, राखियां भी सजीं और मिठाइयां भी बंटी, लेकिन मनावर के भाजपा परिवार में इस बार एक परंपरा गायब रही। जिन कलाइयों पर हर साल अपनत्व का रक्षा सूत्र बंधता था, वे इस बार सूनी रह गईं। वर्षों से चली आ रही राजनीतिक रिश्तों की यह परंपरा अचानक थमी तो कार्यकर्ताओं के मन में सवाल भी उठे और कसक भी। पूर्व कैबिनेट मंत्री रंजना बघेल विगत कई वर्षों से रक्षाबंधन पर मनावर विधानसभा क्षेत्र के भाजपा पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचकर राखी बांधती रही हैं। यह महज राखी नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के साथ पारिवारिक अपनत्व का प्रतीक माना जाता रहा है। मनावर, गंधवानी, धरमपुरी और कुक्षी चार विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर धार जिला ग्रामीण बनने के बाद जब ऊर्जावान जिला पंचायत सदस्य चंचल पाटीदार को जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली, तो उन्होंने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। रक्षाबंधन पर भाजपा परिवार की बहनों से रक्षा सूत्र बंधवाकर कार्यकर्ताओं के बीच अपनत्व का संदेश दिया। मगर इस बार दोनों ही नजर नहीं आए। न बहन राखी बांधने पहुंचीं और न भाई ने अपनी कलाई आगे की। भाजपा परिवार के भाई-बहन इंतजार करते रहे और देखते-देखते रक्षाबंधन का त्यौहार गुजर गया… पीछे रह गईं तो बस सूनी कलाइयां और कई अनकहे सवाल… ‘हमें धन-दौलत नहीं चाहिए, रिश्ते तो निभाइए भैया…’ कार्यकर्ताओं की नाराजगी किसी पद या लाभ को लेकर नहीं, बल्कि अपनत्व को लेकर है। उनका कहना है कि उन्होंने कभी नेताओं से धन-दौलत या वैभव नहीं मांगा। चुनाव में जीत मिले या हार, नेताओं के प्रति उनका सम्मान और श्रद्धाभाव कायम रहा है…।

उनकी पीड़ा कुछ यूं सामने आती है—“भैया, हमने आपसे आखिर मांगा ही क्या है? न धन चाहिए, न दौलत, न कोई उपहार। बस इतना चाहते हैं कि जो अपनत्व वर्षों से मिला, वह बना रहे… फिर इस बार ऐसा क्या हुआ कि हमें ही भूल गए…?”

कार्यकर्ताओं का व्यंग्य भी कम चुभने वाला नहीं है— “भैया, आप तो जिलाध्यक्ष हो… सांसद सावित्री ठाकुर केंद्रीय राज्यमंत्री हैं। आपका ठाठ-बाठ अपनी जगह है। लेकिन हमने ऐसी कौन-सी गुस्ताखी कर दी कि रक्षाबंधन पर बहनों की आरती की थाल हमारी कलाई ही याद नहीं रही?”

चुनाव में कार्यकर्ता जरूरी, त्योहार पर क्यों नहीं?
कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव आते ही यही भाजपा परिवार बूथ से लेकर मैदान तक सक्रिय हो जाता है। कार्यकर्ता धूप-बारिश की परवाह किए बिना संगठन के लिए खड़ा रहता है। नेताओं के लिए नारे लगाता है, प्रचार करता है और जीत के लिए मेहनत करता है। ऐसे में रक्षाबंधन जैसे अवसर पर दो पल का अपनत्व भी न मिले तो सवाल उठना स्वाभाविक है। कार्यकर्ताओं की अपेक्षा भी बहुत छोटी है—रिश्ता राजनीतिक हो सकता है, लेकिन अपनत्व राजनीतिक नहीं होना चाहिए। ‘हमें कुछ नहीं चाहिए… बस मनावर का विकास चाहिए’ कार्यकर्ताओं ने साफ कहा कि उन्हें किसी से कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं चाहिए। उनकी अपेक्षा है कि मनावर का विकास हो, क्षेत्र की जनसमस्याओं का समाधान हो और वर्षों से उठ रही जनता की आवाज को गंभीरता से सुना जाए।

उनका कहना है कि नेताओं से उनका रिश्ता किसी चुनावी नतीजे का मोहताज नहीं है। वे आज भी सम्मान करते हैं और आगे भी करते रहेंगे। लेकिन इस बार रक्षाबंधन पर खाली रह गई कलाइयां शायद एक सवाल जरूर छोड़ गई हैं— “रिश्ते सिर्फ चुनाव तक के थे या रक्षाबंधन की डोर सचमुच अपनत्व की थी?” अब देखना यह है कि अगले रक्षाबंधन तक सूनी कलाइयों की यह कसक दूर होती है या भाजपा परिवार के रिश्तों में आई यह दूरी और गहरी होती है।