गणेश पाण्डे , अखंड भारत समाचार डिण्डौरी
डिंडौरी, नगर परिषद डिंडौरी में जनहित से जुड़ी योजनाओं और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है। किफायती आवास योजना के तहत गरीब हितग्राहियों से वसूली गई लाखों रुपये की राशि नगर परिषद के सरकारी खाते में जमा न होने से बड़ा प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया है। हैरानी की बात यह है कि राज्यमंत्री द्वारा दिए गए स्पष्ट निर्देशों और पत्र के बावजूद करीब एक साल बाद भी मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
क्या है पूरा मामला?
डिंडौरी नगर परिषद में एएचपी आवास योजना के आवंटन और रसीदों को लेकर लंबे समय से अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं। योजना के नाम पर कई पात्र हितग्राहियों से लाखों रुपये एकत्र किए गए, लेकिन यह राशि परिषद के आधिकारिक खाते में दर्ज ही नहीं हुई।
इसके अलावा, जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि एक ही रसीद क्रमांक पर दो अलग-अलग रसीदें जारी की गई हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वसूली प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर हेरफेर और फर्जीवाड़ा किया गया है।
प्रभारी मंत्री का पत्र भी साबित हुआ बेअसर
मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी ने 11 नवंबर 2025 को डिंडौरी कलेक्टर को एक आधिकारिक पत्र भेजा था। इस पत्र में उन्होंने मुख्य रूप से तीन गंभीर बिंदुओं पर त्वरित जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए थे:
एएचपी आवास रसीदों और वसूली गई राशि का हिसाब: फर्जी रसीदों और जमा न की गई रकम की निष्पक्ष जांच।
सरकारी वाहनों का अनुचित उपयोग: नगर परिषद के वाहनों के निजी व नियमविरुद्ध इस्तेमाल की जांच।
बाजार वसूली ठेके में अनियमितता: बाजार वसूली प्रक्रिया में बरती गई गड़बड़ियों की पड़ताल।
मंत्री के निर्देश के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी, लेकिन प्रशासनिक ढिलाई के कारण मामला जस का तस बना हुआ है।
वर्तमान सीएमओ ने मानी गड़बड़ी, दर्ज होगी एफआईआर
नगर परिषद के मुख्य नगरपालिका अधिकारी वेद प्रकाश गोस्वामी ने रसीदों में हुई गड़बड़ी और अनियमितताओं की बात स्वीकार की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि होने पर दोषी कर्मचारियों व संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।
जनता और हितग्राहियों के मन में उठ रहे सवाल
कार्रवाई में हो रही देरी से डिंडौरी के नागरिकों और पीड़ित हितग्राहियों में भारी आक्रोश है। लोग अब यह सवाल उठा रहे हैं कि:
आखिर मंत्री के पत्र के बाद भी जिला प्रशासन द्वारा जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
जिन गरीब हितग्राहियों ने अपने खून-पसीने की कमाई जमा की है, उनके पैसे का हिसाब कौन देगा?
फर्जी रसीदें काटने वाले और इस पूरे तंत्र को संरक्षण देने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर कब तक कार्रवाई होगी?
