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Dharक्राइममध्य प्रदेश

किसान के खेत में नरवाई जली तो जुर्माना, कंपनियों के प्रदूषण पर कार्रवाई कब?

पर्यावरण संरक्षण के नियम सबके लिए समान हों, किसानों पर सख्ती के साथ औद्योगिक प्रदूषण की भी हो निष्पक्ष जांच.... रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597 मनावर। जिला धार।। पर्यावरण…

किसान के खेत में नरवाई जली तो जुर्माना, कंपनियों के प्रदूषण पर कार्रवाई कब?
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पर्यावरण संरक्षण के नियम सबके लिए समान हों, किसानों पर सख्ती के साथ औद्योगिक प्रदूषण की भी हो निष्पक्ष जांच….

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597

मनावर। जिला धार।। पर्यावरण संरक्षण और जनस्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए धार जिला प्रशासन ने खेतों में नरवाई जलाने पर प्रतिबंध लगाते हुए उल्लंघन करने वाले किसानों पर 2,500 से 15,000 रुपये तक अर्थदंड लगाने का प्रावधान किया है। 11 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश के अनुसार यह प्रतिबंध 6 दिसंबर 2026 तक प्रभावशील रहेगा। प्रशासन ने फसल कटाई में कंबाइन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) अथवा स्ट्रा रीपर का उपयोग भी अनिवार्य किया है। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से यह कदम महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है कि जब पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के मामलों में किसानों पर सख्ती की जाती है, तो औद्योगिक इकाइयों और बड़ी कंपनियों से होने वाले प्रदूषण की निगरानी तथा कार्रवाई में भी क्या उतनी ही तत्परता दिखाई जाती है?

जनहित से जुड़ा यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पर्यावरण प्रदूषण की समस्या केवल खेतों में फसल अवशेष जलाने तक सीमित नहीं है। प्लास्टिक कचरे का अनुचित निपटान, औद्योगिक अपशिष्ट को खुले में फेंकना और निर्धारित मानकों के विपरीत कचरा जलाना भी पर्यावरण एवं जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। ऐसे में जरूरी है कि प्रदूषण रोकने के नियमों का पालन हर स्तर पर सुनिश्चित किया जाए।

*किसानों पर जुर्माने का प्रावधान, लेकिन बड़े प्रदूषणकारी स्रोतों की निगरानी भी जरूरी*

जिला प्रशासन के आदेश में नरवाई जलाने से मिट्टी की उर्वरता कम होने, लाभदायक सूक्ष्म जीवों के नष्ट होने तथा वायु प्रदूषण बढ़ने की आशंका का उल्लेख किया गया है। इसी आधार पर किसानों को फसल अवशेष जलाने के बजाय उनका उपयोग भूसा बनाने, खेतों में आच्छादन करने और आधुनिक कृषि यंत्रों से सीधे बोनी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

हालांकि, किसानों की परेशानी का दूसरा पहलू भी है। फसल कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों का प्रबंधन करने के लिए मशीनों, ईंधन और श्रम पर खर्च करना पड़ता है। छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए यह खर्च अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है। ऐसे में प्रतिबंधात्मक आदेशों के साथ किसानों को उचित तकनीकी मार्गदर्शन, कृषि यंत्रों की उपलब्धता और आवश्यक सहायता देना भी महत्वपूर्ण है।

दूसरी ओर, यदि किसी औद्योगिक इकाई द्वारा प्लास्टिक अथवा औद्योगिक कचरे का अनुचित निपटान किया जाता है या निर्धारित पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करते हुए उसे जलाया जाता है, तो संबंधित मामले की भी नियमानुसार जांच और कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि, किसी कंपनी के विरुद्ध कार्रवाई का प्रश्न वास्तविक तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू पर्यावरणीय नियमों के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए। सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार मनावर नगर से आएदिन कई वाहन बेरोकटोक गुजरते है जिनकी जांच की जाना आवश्यक है।

*हजारों टन प्लास्टिक कचरे के निपटान पर उठते हैं सवाल*

सार्वजनिक हित से जुड़ा एक सवाल यह भी है कि यदि कोई बड़ी कंपनी या औद्योगिक इकाई हजारों टन प्लास्टिक अथवा औद्योगिक कचरे का परिवहन करती है और उसके निपटान के दौरान कचरा सड़कों पर बिखरता है या उसे निर्धारित मानकों के विपरीत जलाया जाता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के लिए कौन-सी व्यवस्था सक्रिय होती है?

क्या ऐसे मामलों में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नियमित निरीक्षण करता है? क्या औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट प्रबंधन की जांच होती है? यदि नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो संबंधित इकाई पर क्या कार्रवाई की जाती है? इन सवालों का जवाब पारदर्शी जांच और सार्वजनिक जानकारी के माध्यम से सामने आना चाहिए।

यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि किसी कंपनी के आकार या बहुराष्ट्रीय होने से उसे पर्यावरणीय नियमों से छूट नहीं मिलती। जिस प्रकार किसान को नरवाई जलाने से रोकने के लिए नियमों का पालन करना होता है, उसी प्रकार औद्योगिक इकाइयों को भी अपने अपशिष्ट का सुरक्षित और नियमानुसार निपटान करना होता है।

*पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी सभी की, कार्रवाई में भेदभाव नहीं होना चाहिए*

पर्यावरण संरक्षण के लिए नरवाई जलाने पर रोक लगाना आवश्यक हो सकता है, लेकिन इसके साथ प्रदूषण के अन्य स्रोतों पर भी समान गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है। खेतों में नरवाई जलाने से होने वाला प्रदूषण हो या उद्योगों से निकलने वाला धुआं और अपशिष्ट—दोनों मामलों में नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

यदि प्रशासन किसानों से पर्यावरण संरक्षण की अपेक्षा करता है, तो औद्योगिक इकाइयों और कचरा प्रबंधन से जुड़ी संस्थाओं की जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए। इसके लिए नियमित निरीक्षण, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई, उल्लंघन की स्थिति में नियमानुसार दंड और कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करना उपयोगी कदम हो सकते हैं।

*प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जनहित में अपेक्षा*

धार जिले में नरवाई जलाने पर प्रतिबंध के आदेश के बाद अब यह अपेक्षा भी की जा रही है कि संबंधित विभाग पर्यावरण प्रदूषण के अन्य संभावित स्रोतों की निगरानी पर ध्यान दें। यदि कहीं प्लास्टिक या औद्योगिक कचरा खुले में फेंकने, सड़कों पर बिखेरने अथवा नियमों के विरुद्ध जलाने की शिकायत मिलती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार पक्ष के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

सवाल किसी एक वर्ग को राहत देने या दूसरे वर्ग को निशाना बनाने का नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के नियमों को निष्पक्ष रूप से लागू करने का है। किसान हो या बड़ी औद्योगिक कंपनी, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी कृत्य पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर स्वच्छ हवा, उपजाऊ मिट्टी और सुरक्षित पर्यावरण पर अधिकार समाज के हर व्यक्ति का है, और इसे बचाने की जिम्मेदारी भी सभी की है।