अल्पवर्षा के बीच खेती और पेयजल में संतुलन की चुनौती, किसानों ने उठाए सवाल.. फसलें नहीं पकेंगी तो गेहूं-चना और पशुओं के लिए चारा कहां से आएगा?…
रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। जिला धार।। इस वर्ष अल्पवर्षा के कारण धार जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में जलस्रोतों का जलस्तर घटने से किसानों के सामने सिंचाई का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे समय में जनपद पंचायत मनावर द्वारा ग्राम पंचायतों के शासकीय तालाबों, कुओं, पोखरों और नलकूपों से बिना अनुमति सिंचाई एवं अन्य कार्यों के लिए पानी का उपयोग नहीं करने के निर्देश जारी किए गए हैं। प्रशासन का तर्क है कि इन जलस्रोतों में उपलब्ध पानी पेयजल और पशुओं के पीने के लिए सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि आगामी ग्रीष्मकाल में जलसंकट की स्थिति उत्पन्न नहीं हो।
वहीं, किसानों के सामने दूसरी गंभीर चुनौती खड़ी है। अल्पवर्षा से खेतों में पर्याप्त नमी नहीं है और बिजली कटौती के कारण भी सिंचाई प्रभावित हो रही है। ऐसे में किसान सवाल उठा रहे हैं कि यदि समय पर पानी नहीं मिला तो खेतों में खड़ी फसलों को कैसे पकाया जाएगा? गेहूं-चना जैसी आगामी फसलों के लिए जमीन में नमी कैसे बनेगी और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था कैसे होगी? किसानों का कहना है कि प्रशासन को पेयजल संरक्षण के साथ-साथ खेती और पशुपालन पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखकर व्यावहारिक समाधान निकालना चाहिए।
*जनपद पंचायत ने जारी किए निर्देश, तीन दिन में मांगी जलस्रोतों की जानकारी*
जनपद पंचायत मनावर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी कार्यालय द्वारा 9 अक्टूबर 2026 को पत्र क्रमांक 5399/जनपद/2026 जारी किया गया है। इसमें समस्त ग्राम पंचायतों के सरपंचों और सचिवों को निर्देशित किया गया है कि ग्राम पंचायत क्षेत्र में स्थित शासकीय तालाबों, कुओं, पोखरों और नलकूपों से बिना अनुमति सिंचाई अथवा अन्य कार्यों के लिए पानी का उपयोग नहीं किया जाए।
पत्र में उल्लेख किया गया है कि कलेक्टर द्वारा आयोजित बैठक में दिए गए निर्देशों के अनुसार इस वर्ष अल्पवर्षा के कारण जलस्रोतों का जलस्तर काफी कम है। ये जलस्रोत पेयजल और पशुओं के पीने के पानी के प्रमुख साधन हैं। कुछ ग्राम पंचायतों में इन स्रोतों के पानी का उपयोग सिंचाई एवं अन्य कार्यों के लिए बिना अनुमति किए जाने की जानकारी सामने आई है। इससे आगामी ग्रीष्मकाल में पेयजल संकट उत्पन्न होने की आशंका जताई गई है।
जनपद पंचायत ने ग्राम पंचायतों को गांवों में प्रचार-प्रसार कराने और संबंधित जलस्रोतों के पास सूचना बोर्ड लगाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, पानी का दुरुपयोग करने वालों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई कर रोक लगाने तथा की गई कार्रवाई की जानकारी कार्यालय को देने के लिए कहा गया है। ग्राम पंचायतों में मौजूद शासकीय तालाबों, कुओं, पोखरों और नलकूपों की जानकारी निर्धारित प्रपत्र में तीन दिन के भीतर उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।
*किसानों का सवाल—फसलें नहीं पकेंगी तो अन्न और चारा कहां से आएगा?*
प्रशासन द्वारा जलस्रोतों से सिंचाई पर रोक लगाने संबंधी निर्देशों के बीच किसान हितों को लेकर भी चर्चा तेज हो सकती है। किसानों का कहना है कि पेयजल संरक्षण आवश्यक है, लेकिन खेती की अनदेखी करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। खेतों में खड़ी फसलों को पकाने के लिए यदि आवश्यक पानी नहीं मिला तो किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
किसानों के सामने केवल वर्तमान फसल बचाने का सवाल नहीं है, बल्कि आगामी रबी सीजन की तैयारी भी चुनौती बनी हुई है। गेहूं और चने की बुवाई के लिए खेतों में पर्याप्त नमी जरूरी है। दूसरी ओर, यदि खरीफ की फसलें प्रभावित होती हैं तो पशुओं के लिए भूसे और अन्य चारे की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है।
किसानों का तर्क है कि यदि अन्नदाता अपनी फसल ही नहीं बचा पाएगा तो आम जनता के लिए गेहूं-चना उपलब्ध कराने और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी कैसे पूरी होगी? प्रशासन को इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। जलस्रोतों के संरक्षण के साथ किसानों की फसलों को बचाने के लिए भी स्पष्ट नीति और व्यावहारिक व्यवस्था जरूरी है।
*धार जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग, फिर भी समाधान का इंतजार*
धार जिले में अल्पवर्षा और सिंचाई संबंधी समस्याओं को लेकर सूखा घोषित करने अथवा अकाल जैसी परिस्थितियों के अनुरूप राहत देने की मांग लगातार उठाई जा रही है। विपक्षी जनप्रतिनिधियों और किसानों द्वारा भी इस संबंध में मांग किए जाने की बात सामने आती रही है। इसके बावजूद किसानों को राहत और सहायता के संबंध में स्पष्ट निर्णय का इंतजार है।
किसानों का कहना है कि जब बारिश कम हुई है, जलस्रोतों का स्तर गिर रहा है और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं है, तब प्रशासन को प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति का आकलन कर आवश्यक कदम उठाने चाहिए। फसलों की स्थिति, वर्षा के आंकड़ों, जलस्रोतों के स्तर और कृषि पर पड़ने वाले प्रभावों का निष्पक्ष आकलन करके किसानों को राहत देने के संबंध में निर्णय लिया जाना चाहिए।
सूखा घोषित करने का निर्णय निर्धारित मानकों और आधिकारिक आकलन के आधार पर होता है, लेकिन किसानों की मौजूदा परेशानियों के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाने में देरी नहीं होनी चाहिए।
*अन्नदाता की चिंता दूर करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी*
किसानों का कहना है कि कृषि केवल किसान की आजीविका का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। खेती से ही अनाज, पशुओं के लिए चारा और अनेक कृषि आधारित व्यवसायों को आधार मिलता है। किसानों की आय से ग्रामीण बाजारों में व्यापारिक गतिविधियां चलती हैं तथा कृषि उत्पादन का व्यापक प्रभाव आर्थिक व्यवस्था पर पड़ता है।
ऐसे में किसानों के सामने जब पानी, बिजली और फसल बचाने का संकट हो, तब प्रशासन से राहतकारी और किसान हितैषी कदमों की अपेक्षा स्वाभाविक है। किसानों की समस्याओं को नजरअंदाज किए जाने की भावना ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष बढ़ा सकती है।
पेयजल और पशुओं के लिए पानी सुरक्षित रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी किसानों की आजीविका और खाद्यान्न उत्पादन को बचाना भी है। प्रशासन को जलस्रोतों के संरक्षण और सिंचाई की जरूरतों के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसी व्यवस्था तैयार करनी चाहिए, जिससे पीने के पानी की उपलब्धता भी बनी रहे और किसानों की फसलें भी बर्बाद न हों।
अब सवाल यह है कि अल्पवर्षा से जूझ रहे किसानों को राहत देने, सिंचाई के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने और संभावित सूखे के प्रभावों से बचाने के लिए प्रशासन क्या ठोस कदम उठाता है। किसानों को केवल प्रतिबंधात्मक निर्देशों के बजाय ऐसी कार्ययोजना की जरूरत है, जो जल संरक्षण के साथ खेती, पशुपालन और ग्रामीण जनजीवन की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखे।
